मास्को और तेहरान में क्या कूटनीतिक फतेह कर पाया भारत ?

  • मास्को में शंघाई सहयोग संगठन के रक्षामंत्रियों की बैठक में भारत की दो टूक
  • मास्को से सीधे तेहरान पहुंचने का मतलब रक्षामंत्री की कूटनीति या कमजोरी ?

फोकस भारत। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तेहरान में हैं जहां उनकी मुलाकात ईरान के रक्षामंत्री ब्रिगेडियर जनरल अमीर हातमी से हुई। इस औचक मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं, हालांकि बैठक में ईरान और भारत के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने पर बात किये जाने के साथ साथ अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता लाने पर भी विचार किया गया। मास्को से अचानकर रक्षा मंत्री का ईरान पहुंच जाना क्या संदेश देता है, इसके अलग अलग मायने निकाले जा रहे हैं।

(ईरान के रक्षा मंत्री के साथ राजनाथ सिंह)

गौरतलब है कि भारत और ईरान की दोस्ती पुरानी है, दोनों दोस्तों के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर समझौता भी हुआ था, जिसके रास्ते भारत अफगानिस्तान में अपना नियंत्रण बढ़ाना चाहता था, लेकिन चीन ने इस दोस्ती में सेंधमारी की और ईरान में अरबों डॉलर के निवेश का एक करार कर लिया, जिसके तहत वह 25 साल तक ईरान से सस्ता तेल लेगा और बदले में ईरान में ढांचागत विकास में निवेश करेगा। इसी समझौते के कारण ईरान और अमेरिका के बीच भी खटास बढ़ गई। लेकिन भारत किसी भी हाल में अपने दोस्त ईरान को दूर नहीं जाने देना चाहता है। ऐसे में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की ईरान की यह यात्रा बहुत कुछ संदेश देती है। मास्को में हुई शंघाई सहयोग संगठन की रक्षामंत्रियों की बैठक में भी राजनाथ सिंह ने दोहराया कि चीन एलएसी का सम्मान करे और भारत अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा।

दरअसल चीन अपने आप को दुनिया की नंबर एक शक्ति के रूप में देखने लगा है। उसकी यही सोच विस्तारवाद को बढ़ावा दे रही है। कोरोना संक्रमण के बाद अमेरिका और चीन के बीच जुबानी टकराहट चरम पर पहुंची और अमेरिका ने चीन पर  कई तरह से प्रतिबंध लगाया। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती दोस्ती भी चीन के लिए आंख का कांटा बनी हुई है। लिहाजा अमेरिका को सबक सिखाने के लिए चीन अपने पड़ोसी भारत पर ऐसी छेड़ को अंजाम दे रहा है कि अमेरिका उसमें दखल दे और भारत के बहाने वह अमेरिका से झगड़ा मोल ले सके। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी अपनी सरकार की विस्तारवादी सोच के अधीन है। लिहाजा एक तरफ बातचीत से रास्ता निकालने की कोशिशें की जा रही हैं तो दूसरी तरफ शी जिनपिंग के इशारे पर घुसपैठ की लगातार कोशिशें भी हो रही हैं। अगस्त के आखिरी सप्ताह में भारत और चीन के बीच ब्रिगेडियर कमांडर स्तर की बात हो रही थी, तब भी चीनी सैनिकों की निगाह ब्लैक टॉप माउंटेन पर थी, लेकिन उनके मंसूबे पूरे होने से पहले भारतीय फौज ने इस महत्वपूर्ण इलाके को कब्जे में ले लिया। ब्लैक टॉप पर तिरंगे का मतलब है पैंगोंग के पूरे इलाके में भारत का दबदबा होना।

सिर्फ ब्लैक टॉप ही नहीं, लद्दाख की पहाड़ियों पर युद्ध कौशल में सक्षम आईटीबीपी यानी इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस के लगभग तीन दर्जन जवानों ने कुछ और जगहों पर अपनी पैठ जमा ली है। इससे लद्दाख की पूर्वी सीमा पर हेलमेट टॉप, ब्लैक टॉप और येलो बम्प पर इंडियन आर्मी, इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस और स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ने मोर्चाबंदी कर ली है। ये तीनों तरह की कमांड पहाड़ों पर युद्ध करने में कुदरती तौर पर भी सक्षम हैं। दरअसल लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर ब्लैक टॉप भारत के ही हिस्से में आता है, लेकिन चीनी सैनिकों ने यहां अपने उपकरण जमा कर लिये थे और अगस्त के आखिर में कब्जा करने की नीयत से आगे बढ़ रहे थे, लेकिन भारतीय सेना ने इस इलाके को अब पूरी तरह कंट्रोल में कर लिया है। ये काम आईटीबीपी के जवानों ने किया, वे फुरचुक दर्रे से ब्लैक टॉप पर पहुंच गए। इससे अब इंडियन आर्मी चीनी सेना के दक्षिण के पोस्ट नंबर 4280, डिगिंग एरिया और चामला जैसे इलाकों में होने वाली हरकत पर नजर रख सकेगी। एलएसी के पास आईटीबीपी ने 39 एरिया में अपना दबदबा कायम कर लिया है।

(मास्को : चीनी रक्षामंत्री से वार्ता करते राजनाथ सिंह)

उल्लेखनीय है कि भारत आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक तीनों स्तर पर चीन की हर रणनीति का पुख्ता जवाब दे रहा है। भारत लगातार चीन के प्रोडक्ट और मोबाइल एप्लीकेशंस पर बैन लगाता जा रहा है। भारतीय सेना चीन को लद्दाख में घुसने का मौका नहीं दे रही है और प्रधानमंत्री मोदी से लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह वैश्विक स्तर पर चीन की घेराबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं।

रूस का  दौरा खत्म कर लौट रहे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह अचानक ईरान की राजधानी तेहरान पहुंच गए। उनके ईरान के रक्षा मंत्री ब्रिगेडियर जनरल आमिर हतामी से मुलाकात करने के कार्यक्रम ने चीन के साथ साथ पाकिस्तान के भी कान खड़े कर दिये हैं। इससे पहले मास्को में शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की बैठक में भी रक्षामंत्री ने अपनी बात दो टूक कह दी। साथ ही मध्य एशियाई देशों उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और ताजिकिस्तान को लेकर भी सहयोगात्मक रवैया दिखाया। बड़ी बात ये रही कि बिना तय कार्यक्रम के रक्षामंत्री ​मास्को में ​तजाकिस्तान, कजाकिस्तान और ​उज्बेकिस्तान देशों के रक्षामंत्रियो से मिले। भारत ने ईरान के साथ चाबहार पोर्ट पर समझौता किया था लेकिन चीन ने अरबों डॉलर की डील ईरान से कर इस समझौते को प्रभावित करने की कोशिश की, कहा जा रहा है कि अपने हितों की रक्षा के लिए भारत लगातार ईरान के संपर्क में है।

रिपोर्ट- आशीष मिश्रा