‘पुलिस वाली दीदी’: कैंसर को दी मात, महज एक कहानी नहीं बल्कि मिसाल ‘सुनीता चौधरी’

फोकस भारत।( inspirational story of rajasthan sunita chaudhary police wali didi) सफर-ए-ज़िंदगी के पन्नों को पलटते हुए सुनीता चौधरी बताती हैं कि मैं महज तीन साल की थी, गांव के एक लड़के से शादी हो गई, मैं शादी करने के मतलब को समझने के लिए बहुत छोटी थी। ठीक से चलना क्या होता है, तब वो जानती भी नहीं थी।  जो खुद मां के आंचल में छुपकर खेलती थी, उसे किसी के घर की इज्जत का आंचल बना दिया गया।  बड़ी नटखट और मासूम थी।  बदमाश मां की उंगली पकड़कर चलती थी वो मासूम, पर उसे नहीं पता था कि ज़ालिम दुनिया की रवायतें उसे किसी और का सहारा बना देंगी। कैसी होगी वो मासूम कली, जिसे खिलने से पहले महज तीन साल की उम्र में ही किसी के घर की क्यारी बना दिया जाए, भले ही गौना नहीं किया गया पर खिलौने से खेलने वाली उम्र में अगर हाथों में मेंहदी लग जाए तो क्या वो समझ पाई होगी कि हो क्या रहा है।

हैरान रह गए न आप तो हैरान ही हुए हैं, ज़रा उसकी सोचिए जिसके ऊपर ये दास्तां गुजरी है, तीन साल की उम्र में शादी, फिर अपनी ही पढ़ाई के लिए समाज और पिता की मान-मनौव्वल और फिर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से संघर्ष। इतनी सारी मुश्किलों के बाद इंसान तो क्या, पत्थर भी घुटने टेक दे।  पर सुनीता तो राजस्थान की मुश्किलों के रेत में वो कैक्टस का पौधा बनकर उभरीं, जो तेज़ संघर्षों के अंधड़ और रेतीले तूफानों को भी मात देकर और कांटों का शूल सहकर भी खड़ी रहीं। कैंसर जैसे कंटीले दर्द को भूलकर उन्होंने ‘पुलिस वाली दीदी’ के रूप में मिसाल पेश की कि हर कोई उनके जैसी ही बेटी चाहने लगा। आप जानते हैं कि एक जमाने में राजस्थान में बेटी का पैदा होना मानों अभिशाप माना जाता था पर एक तो लड़की, फिर तीन साल की उम्र में शादी, इसके बाद कैंसर जैसी बीमारी, मानों सारे गम सुनीता की जिंदगी में ही लिख दिए गए थे पर आपने तो सुना ही होगा –
पानी हैं मंज़िलें तो राहों का होना ही होगा,
कुछ पाने के लिए जिंदगी में कुछ तो खोना ही होगा,
बिना संघर्ष किसे मिलती है कामयाबी यहां,
कुछ समय तक तो कठिनाइयों का बोझ ढोना ही होगा।

कुछ ऐसी है राजस्थान के थार की पुलिस वाली दीदी (Police Wali Didi)

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सुनीता की कहानी

सफर-ए-ज़िंदगी के पन्नों को पलटते हुए सुनीता चौधरी बताती हैं कि मैं महज तीन साल की थी, गांव के एक लड़के से शादी हो गई, मैं शादी करने के मतलब को समझने के लिए बहुत छोटी थी, राजस्थान में उस समय बाल विवाह होना आम बात थी, 18 साल की होने के बाद मुझे भी ससुराल भेज दिया गया था।

जब अपने बाऊजी से पढ़ाई के लिए करनी पड़ीं मिन्नते

राजस्थान में उस समय एक लड़की होकर पढ़ाई की बात करना ठीक उसी तरह था, मानों 14 की उम्र में बेटे का बाप से बुलेट मांग लेना. सुनीता ने जब स्कूल जाने की मांग की थी तो पहले उनके पिताजी थोड़ा हिचकिचाए पर फिर बेटी की लगन देखकर कुछ नर्म हो गए, उन्होंने 5 साल की सुनीता को स्कूल भेजना शुरू कर दिया, बड़ी मुश्किल से पढ़ने का मौका मिला तो बिजली नहीं. बेचारी सुनीता दिन-भर खेतों में काम करके आती. फिर लालटेन जलाकर पढ़ाई करती थी।

जब पिताजी ने कहा- तेरा ऑफिसर बनने का सपना पूरा होना ही चाहिए
5वीं पास कर चुकी सुनीता जब 6 किमी दूर पैदल पढ़ने जाती थी तो गांव वाले कहते- ओ सुनीता, काहे पढ़ रही हो? कौनो पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहे है, बेकार है सब, सुनीता इन बातों को अनसुना करके अपनी आगे की पढ़ाई के लिए रोज जाती रहीं, 10वीं में डिक्टेंशन पाकर वह शहर चली गईं, यहां पता चला कि पुलिस में भर्ती निकली है, बिना कुछ सोचे-समझे सुनीता ने आवेदन किया और उनकी हिम्मत का नतीजा भी देखिए परीक्षा पास करने वाले 50 उम्मीदवारों में इकलौती वह लड़की थी।

पुलिस साहिबा आ रही हैं

9 महीने के बाद मैं अपने गांव से कॉन्स्टेबल बनने वाली पहली महिला थी, उस समय मेरी उम्र केवल 19 साल थी, सुनीता भरी आंखों से बताती हैं कि मुझे आज भी वो दिन याद है, जब मैं वर्दी पहनकर गांव पहुंची तो सबने मुझे सैल्यूट किया था. सब कहते- देखो, पुलिस साहिबा आ रही हैं।

सुनीता की खुशियों को लगी कैंसर की नज़र

ज़िंदगी के सपनों को सफलता के पंख लगने के बाद अभी सुनीता उड़ने ही वाली थईं कि डॉक्टर ने उन्हें बताया कि उन्हें कैंसर हो गया है, वह दूसरे स्टेज तक पहुंच गया है, यह सुनकर उनका दिल अंदर ही अंदर रो पड़ा, वह उड़ने के बजाय मानों धड़ाम से जमीन पर आ गिरीं पर इससे वह टूटी नहीं, हिम्मत से सामना करने का फैसला किया।

रूह कांप जाती है उन 6 महीनों के जिक्र से

वैसे सुनीता काफी मजबूत इरादों वाली महिला हैं पर कैंसर वाले 6 महीनों को याद कर उनकी आंखें भर आती हैं। 6 महीनों में 6 कीमोथेरेमी से उनके सारे बाल झड़ गए। आस-पड़ोस के लोग उनके पिता को ताने देते कि बेटी पर इतना खर्च क्यों कर रहे हो? पर एक पिता एक बेटी का सुपरहीरो होता है, उनके पिता ने उनका इलाज जारी रखा। इस दौरान लोग सुनीता को गंजी कहकर बुलाते थे, ड्यूटी पर वापस लौटने के बाद सुनीता किसी न किसी कैप से खुद के सिर को ढक कर रखती थी।

जब पति ने कही ऐसी बात
कहते हैं कि ज़िंदगी की डगर कितनी ही कठिन क्यों न हो, पर हमसफर साथ हो, तो हर सफर आसांन हो जाता है। कैंसर से जूझ रही सुनीता ने यह ओवरियन कैंसर वाली बात जब पति को बताई और कहा कि मेरे मां बनने की संभावनाएं बेहद कम हैं तो उनके पति ने बेहद ही सादगी से कहा- मैं सिर्फ तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं। मुझे तुम्हारे सिवा कुछ नहीं चाहिए। उनका यह कहना था कि मानों सुनीता ने कैंसर की आधी जंग यूं ही जीत ली थी।

बच्चों ने दिया पुलिसवाली दीदी नाम
इसके बाद धीरे-धीरे सबकुछ ठीक होने लगा। सुनीता ने समाज सेवा करते हुए गरीब बच्चों को यौन शोषण और सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया। इस दौरान जब बच्चों ने सुनीता को पुलिसवाली दीदी नाम दिया, तो उनकी खुशियों में मानो पंख लग गए। 3 साल में उन्होंने एक हजार से ज्यादा बच्चों जागरूक किया। इसके पुलिस कमिश्नर ने सुनीता को सम्मानित किया।

संघर्ष के दिनों में भी ली तस्वीरें
सुनीता बताती हैं कि उन्होंने 25 अल्बम बनाए और अब तो मेरे बाल भी वापिस आ चुके हैं, पर जब भी मैं अपनी बिना बालों की तस्वीरें देखती हूं तो लगता है कि मैं कहां से कहां आ गई हूं।

ये पढ़ने में आपके लिए महज एक कहानी हो सकती है पर सुनीता कैंसर से जूझ रही उन लड़कियों के लिए मिसाल हैं, जिन्हें बाल न होने के चलते शर्मिंदा होती हैं। कैंसर का मुकाबला करना है तो सुनीता की तरह डटे रहो। डरकर अपने हौसले को न गिरने दो, बालों का क्या है – गए तो फिर आएगे

 

रिपोर्ट- सिकंदर शैख