राजस्थान, राजभवन और राजनीति !

  • राजस्थान में ऐतिहासिक सियासी तमाशा 
  • राजभवन में सरकार का ‘डेरा’ 

फोकस भारत। राजस्थान में वह सब कुछ हो रहा है जो यहां राजनीतिक इतिहास में कभी नहीं हुआ। सरकार ने राजभवन के अंदर ही राज्यपाल के खिलाफ अनिश्चित कालीन धरना दे दिया है। राजभवन में राज्यपाल के खिलाफ ही ‘शर्म करो’ के नारे लगाए गए। इस अनिश्चितकालीन धरने के लिए टेन्ट का सामान भी बुलाया जा रहा है। कल देर शाम मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राज्यपाल कलराज मिश्र से मिले थे और सोमवार को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग संबंधी एक चिट्ठी उन्हें सौंपी थी।

लेकिन आज दोपहर तक भी जब राज्यपाल की ओर से कोई संदेश या जवाब नहीं आया तो फेयरमोंट होटल से अपने विधायकों को बसों में भरकर मुख्यमंत्री राजभवन जा पहुंचे। मुख्यमंत्री ने एक बहुत बड़ी बात धमकी की तरह भी कह दी। कहा कि राज्यपाल ने अगर उनकी बात नहीं सुनी तो जनता राजभवन का घेराव भी कर सकती है और इसके लिए वे जिम्मेदार नहीं होंगे। इसके बाद मुख्यमंत्री अपने समर्थिक विधायकों के साथ राजभवन पहुंचे और राज्यपाल से मुलाकात की। वहां अपने विधायकों के समर्थन का हस्ताक्षर पत्र राज्यपाल को सौंपा और राज्यपाल पर विधानसभा सत्र आहूत करने की मांग का दबाव बनाया। लेकिन राज्यपाल ने मामले के संवैधानिक पक्षों को देखते हुए कानूनी सलाह लेने की बात कहकर इजाजत नहीं दी। इसके बाद सरकार के विधायकों ने हंगामा खड़ा कर दिया। नारेबाजी की जाने लगी और राजभवन के लॉन में ही डेरा डालकर अनिश्चित धरने की तैयारी कर ली।

डोटासरा ने किया एलान-ए-प्रदर्शन

उधर, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कांग्रेस के सभी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया है कि कल शनिवार सुबह 11 बजे से पूरे प्रदेश के जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन किया जाए और धरना प्रदर्शन किया जाए। अटैकिंग मूड में नजर आ रहा गहलोत खेमा रोज-दर-रोज आक्रामक होता जा रहा है। खुद शांत माने जाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कई बार आक्रामक तेवर दिखा चुके हैं। आज राजभवन को जनता द्वारा घेरे जाने की धमकी और कल से जिला मुख्यालयों पर धरना प्रदर्शन का आह्वान करके सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया है।

सीएम का दावा, 103 हैं साथ

सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि उनके खेमे के 103 विधायक पूरी तरह साफ हैं और कोरोना, लॉकडाउन के बाद के हालात और मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए विधानसभा का विशेष सत्र आहूत करने की इजाजत मिलनी ही चाहिए। खबर है कि राज्यपाल ने भी कुछ संवैधानिक प्रावधान गिनाकर पूछा है कि विशेष सत्र की वजह बताइये।

हाईकोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट रुख पायलट के पक्ष में

इससे पहले आज हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया है। इस यथास्थिति का मतलब ये है कि पायलट खेमे के खिलाफ स्पीकर अब नोटिस जैसी कोई कार्रवाई नहीं कर पाएंगे। उधर, पायलट खेमे ने केंद्र को भी पक्षकार बनाने की जो मांग की थी कोर्ट ने उसे भी मान लिया। अब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार भी अपना पक्ष रखेगी और मामला लंबा खिंच सकता है। वैसे 27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई करेगी लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ये कहकर कि ‘लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अधिकार है’ साफ इशारा कर दिया था कि उनका रुख किधर है।

गहलोत को जल्दी क्यों है ?

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने राजभवन के घटनाक्रम के बाद पूछा कि मुख्यमंत्री को इतनी जल्दबाजी क्यों है ? पूरा घटनाक्रम सबकी निगाह में है और इसके कुछ संवैधानिक प्रावधानों की समीक्षा होनी है तो मुख्यमंत्री को सब्र रखना चाहिए। वैसे सवाल अभी भी लाजिमी है कि मुख्यमंत्री को इतनी जल्दी क्यों है, दरअसल मुख्यमंत्री का सबसे मजबूत पक्ष ये है कि उनके पास मैजिक नंबर है। वे बार बार दावा कर रहे हैं कि बहुमत उनके पास है। राज्यपाल को वे विधायकों का समर्थन पत्र भी सौंप चुके हैं, ऐसे में अगर विधानसभा आहूत करने का मौका मिल जाता है तो वे बहुमत साबित कर देंगे और इस तरह छह महिने के लिए अविश्वास प्रस्ताव से छुट्टी पा जाएंगे। लेकिन केंद्र सरकार या भाजपा ये नहीं चाहेगी कि मुख्यमंत्री ऐसा कुछ कर सकें।

तो अब क्या होगा ?

कानूनन बात की जाए तो किसी राज्य की सरकार अगर दो बार राज्यपाल से विधानसभा सत्र बुलाने की मांग करती है तो बाध्य होकर राज्यपाल को इसका आदेश देना पड़ता है। फिलहाल मुख्यमंत्री ने आज एक बार राज्यपाल सत्र बुलाने की मांग की है। इस पर राज्यपाल का कहना है कि वे कानूनी सलाह लेने के बाद ही सत्र बुलाने पर फैसला ले सकेंगे। हालांकि दूसरी बार सरकार की ओर से मांग किए जाने के बाद उन्हें आदेश देना ही होगा।

बहरहाल, राजस्थान का सियासी ड्रामा एसओजी दफ्तर से निकलकर कांग्रेस कार्यालय होते हुए मानेसर और फेरमोंट होते हुए हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, अब लौटते हुए राजभवन का चक्कर लगाकर कल सुबह गली-गली सड़क-सड़क पहुंचने वाला है। क्या होगा राजस्थान की राजनीति का अगला ड्रामा, ये कहना फिलहाल बेहद कठिन है।

रिपोर्ट- आशीष मिश्रा