चांद बिहारी नगर, खातीपुरा स्थित सियाराम हॉस्पिटल में लाइफ एंड इकॉनमिक सेविंग केस विषय पर केस स्टडी
सुपरबग-कार्बपेनामेस रेजिस्टेंस एंटेरोबैक्टेरिएस-ईएसबीएल पैदा कर रहा घायल मरीजों के शरीर में तनाव (ऐंठन)

फोकस भारत। दुर्घटना के एक मामले में जयपुर के चांद बिहारी नगर, खातीपुरा स्थित सियाराम हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में इस वर्ष के फरवरी माह में इलाज के लिए राकेश (परिवर्तित नाम) नामक एक मरीज आया, जिसके बाएं पैर के निचले छोर में फ्रैक्चर की शिकायत थी। इस फ्रैक्चर पर भी अन्य फ्रैक्चर्स की तरह ही प्लास्टर (प्लेटिंग) किया गया, जिसे कुछ दिनों बाद हटाने के लिए कहा गया। इस सर्जिकल ट्रीटमेंट के बाद मरीज बिना किसी इन्फेक्शन के सही हो चुका था। कुछ दिनों बाद जब वह प्लेट निकलवाने के लिए आ रहा था, तो उसके प्लेट लगा हुआ पैर एक ट्रक की टक्कर से फिर से दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिससे उसके पैर की ऊपरी टिबिया नामक हड्डी चोटग्रस्त हो गई और चोटग्रस्त जगह पर मिट्टी और संकुचित सीआरई जमा हो गई। इस कारण मरीज इन्फेक्शन का शिकार हो गया और चोटग्रस्त जगह से मवाद निकलने लग गई।
एक सैम्पल कंटेनर में मरीज के बाएं पैर में हुए घाव से मवाद का सैम्पल लेकर कल्चर एवं सेंसिटिविटी की जांच के लिए तुरंत माइक्रोबायोलॉजी लैब में भेजा गया। सैम्पल के लैब में पहुंचने के साथ ही इसे ग्राम अभिरंजन पद्धति से अभिरंजित करने की प्रक्रिया पर कार्य शुरू हुआ, साथ ही ब्लड एगर, मैककॉन्की एगर विभाजित कर लिए जाते हैं, जिसेकी स्थिति जानने के लिए इसे रातभर ऊष्मा प्रदान (इन्कुबेट) की जाती है।
ग्राम अभिरंजक पद्धति से बहुत से न्यूट्रोफिल और ग्राम नेगटिव बैक्टीरिया दिखाई देते हैं।
कल्चर – बहुत से ग्राम नेगटिव बैक्टीरिया समूह अलग हो जाते हैं, पीले और गुलाबी समूह बना लेते हैं। इनके दो समूहों की शुद्ध वृद्धि के लिए इन्हें चार फ्लेम सब-कल्चर द्वारा अलग कर दिया जाता है और समूहों की पहचान के लिए इन्हें वाइटेक (VITEK 2) प्रक्रिया से गुजारा जाता है।
पीले समूह – स्यूडोमोनास एरुजिनोसा, ऑक्सिडेज – पॉजिटिव।
गुलाबी समूह म्यूकॉइड – एस्चेरिचिया कोलाई।
एएसटी – एंटीमाइक्रोबायल सस्सेप्टीबिलिटी जीएनबी और स्यूडो कार्ड का उपयोग किया गया और ऑटोमेटेड कल्चर व सेंसिटिविटी रिपोर्ट को इसके साथ जोड़ा जाता है। वे कोलिस्टिन, टेगसाइक्लिन, जेंटामाइसिन, कॉन्ट्रीमोक्साजोल और पीपरेसिलिन टेजोबैक्टम आदि दवाइयों को छोड़कर अन्य सभी के साथ प्रतिरोधक स्थिति में रहती हैं, साथ ही इन्हें सुपरबग – सीआरई, ईएसबीएल जो क्रिटिकल स्टेज ऑर्गेनिज्म की रचना करते हैं, की जांच की गई।
भाग्यवश, मरीज किसी भी तरह के बुखार से पीड़ित नहीं था, साथ ही उसे इन्फेक्शन भी सामान्य प्रकार का ही था और उसे सामान्य स्तर पर सर्जिकल उपचार उपलब्ध करवा देने के कारण उसकी स्थिति में भी सुधार हो रहा था तथा पोविडोन आयोडीन से उसकी ड्रेसिंग की जा रही थी।
दरअसल मरीज सीआरई-ईएसबीएल/ सुपरबग से सक्रमित था, लेकिन उसे किसी तरह की हायर एंटीबायोटिक नहीं दी गई, फिर भी उसकी हालत में सुधार होने के यह कारण थे –
- सीआरई-ईएसबीएल जनित समस्या उसे संक्रमित घाव के कारण हुई थी।
- सीआरई, ईएसबीएल संक्रमण किसी अन्य जगह न फैलते हुए और किसी और शारीरिक समस्या से न जुड़ते हुए निम्न स्तर पर सम्बंधित स्थान पर ही रहता है।
- बिना किसी एंटीबायोटिक का उपयोग करते हुए सही तरह से सर्जिकल उपचार उपलब्ध करवाया गया और घाव व संक्रमण पर उचित ड्रेसिंग की गई।
- मरीज को सबसे अलग करते हुए सर्वउपयुक्त नर्सिंग केयर प्रदान की गई और सीआरई-ईएसबीएल संक्रमण को अन्य जगह फैलने से रोका गया।
- मरीजों में सुपरबग के कारण होने वाला कष्टदायक संक्रमण, उनके पैदा होने के कारण, सुपरबग के कारण, सर्जिकल व टॉपिकल केयर पर निर्भर करता है।
डॉक्टर के द्वारा प्रदान किए गए सर्वउपयुक्त ड्रेसिंग केयर और सर्जिकल उपचार से मरीज को फाइनेंसियल समस्या से बचाता है, साथ ही कोलिस्टिन (नेफ्रोटॉक्सिक व टेगसाइक्लिन) जैसे महंगे इंजेक्शन का उपयोग न करने से मरीज हायर एंटीबायोटिक्स से होने वाले टॉक्सिक प्रभाव से बच जाता है।
डॉ भगवती चुंडावत(लेखिका)