जानिए वसुंधरा राजे की चुनावी राह के नए सेनापतियों को

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फोकस भारत।

क्या नए रणनीतिकारों के दम पर जीतेगी वसुंधरा ?

राजे के चुनावी रणनीतिकारों का विशलेषण

जानिए राजे की चुनावी राह के नए सेनापतियों को?

इस चुनाव में कैसे बदलेंगे वसुंधरा के रणनीतिकार?

सीएम राजे की चुनावी रणनीति के खास चेहरे?

क्या इस बार बदल गए वसुंधरा के सिपहसालार !

रिपोर्ट- कविता नरूका

राजस्थान की राजनीति में भैरोंसिंह शेखावत जैसे कद्दावर नेता के होते हुए भी जो बीजेपी कभी स्पष्ट बहुमत नही ला पाई थी। वही बीजेपी साल 2003 में पहली बार सूबे में पार्टी की कमान संभालने वाली और झालावाड़ से 5 बार सांसद रह चुकी वसुंधरा राजे के नेतृत्व में 200 सीटो में से 120 सीटे जीतकर इतिहास बनाने में कामयाब रही। आश्चर्य की बात तो ये भी थी कि उस दौर में वसुंधरा की टीम के एक सिपाही ने तो चुनावी नतीजों से पहले ही 120 से ज्यादा सीटे जीतने का दावा कर सबको चौंका दिया था। वसुंधरा की उस टीम में कई चेहरे थे। जिन पर चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी थी। 2003 में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने के बाद साल 2008 में बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई और फिर 2013 में फिर से वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई । 2003 में वसुंधरा राजे परिवर्तन यात्रा और 2013 में सुराज संकल्प यात्रा के जरिए सत्ता के सिंहासन पर काबिज हुई। एक बार फिर वसुंधरा राजे विधानसभा चुनावों के जरिए जनता की कसौटी पर है। इस बार सरकार और सीएम पूरे लवाजमे के साथ हर जिले में जनता के बीच दस्तक दे रही है। लेकिन इस बार वसुंधरा की टीम के कई पुराने चेहरे नदारद है। 2018 के चुनाव में वसुंधरा की टीम के नए सारथियों पर सबकी नजरे हैं।

2018 में वसुंधरा की टीम के नए सिपाही कौन –

युनुस खान- डीडवाना से विधायक और केबिनेट मंत्री युनुस खान सरकार में अहम जिम्मेदारी के साथ ही वसुंधरा राजे के सबसे करीबी माने जाते हैं। वसुंधरा राजे के जिलों में कार्यक्रम की देखभाल का जिम्मा भी खान के हिस्से रहा । वे पूरे पांच साल तक राजे के विश्वसनीय रहे हैं। युनुस खान अल्पसंख्यक चेहरा होने के साथ ही साफ छवि और चुनावी प्रबंधन में बेहतर होने के चलते राजे की टीम के सबसे प्रमुख चेहरे हैं।

अशोक परनामी- वसुंधरा के चहते और विश्वसनीय माने जाने वाले परनामी हालांकि प्रदेशाध्यक्ष से त्याग पत्र दे चुके हैं लेकिन राजे की टीम के प्रभावी चहरे हैं । जो इन चुनावों में भी वित्तीय प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं।

किरण माहेश्वरी – वसुंधरा कैबिनेट में प्रमुख भूमिका निभाने वाली माहेश्वरी राजे पुरानी विश्वसनीय मानी जाती है। मेवाड़ के इलाके में प्रभुत्व रखने वाली माहेश्वरी 2013 में भी वसुंधरा की टीम का प्रमुख हिस्सा रही है।

राजेन्द्र राठौड़ – चुरू से विधायक राठौड़ वसुंधरा केबिनेट का अहम हिस्सा रहे । हालांकि पिछले कुछ सालों से कई मामलों के चलते वसुंधरा राजे से दूरी की चर्चाएं रही हैं। लेकिन सूबे में सीएम राजे और केन्द्र के बीच भाजपा प्रदेशाध्यक्ष को लेकर चली खीचतान चलते एक बार फिर राजेन्द्र राठौड़ वसुंधरा के विश्वसनीय के तौर पर नजर आने लगे हैं। दिल्ली में हुई बैठकों के दौर में राठौड़ वसुंधरा राजे के पक्ष को लेकर सक्रिय दिखे। राठौड़ को वित्तीय प्रबंधन और राजपूत नेताओं में सामजस्य बिठाने में महारत हासिल है। जिसके चलते इसबार भी राठौड़ राजे की टीम में प्रमुख भूमिका में होंगे।

कालीचरण सराफ – सरकार में कैबिनेट मंत्री कालीचरण सराफ चुनावी प्रबंधन में राजे के पुराने विश्वसनीय है। जो इस बार में चुनावों में राजे की टीम का हिस्सा हैं।

महेन्द्र भारद्वाज – वर्तमान में मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार महेन्द्र भारद्वाज वसुंधरा राजे के काफी करीबी माने जाते हैं। साथ ही सीएम की चुनावी टीम का प्रमुख हिस्सा हैं। इसके साथ ही कभी वसुंधरा खिलाफत कर चुके अरूण चतुर्वेदी, और डॉ. किरोड़ी लाल मीणा भी इस बार 2018 के चुनाव मे राजे की टीम शामिल है।

2003 में वसुंधरा के सिपहसालार

प्रमोद महाजन – भाजपा की केन्द्रीय कार्यकारिणी में अहम भूमिका निभाने वाले प्रमोद महाजन न सिर्फ वसुंधरा राजे के करीबी माने जाते थे बल्कि पार्टी को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने से लेकर वसुंधरा राजे की चुनावी रणनीति का बड़ा चेहरा रहे। महाजन वसुंधरा राजे और पार्टी की केन्द्रीय कार्यकारिणी के बीच सेतु माने जाते थे ।

सुधांशु मित्तल- 2003 के विधानसभा चुनावों में मित्तल ने राजे के रणनीतिकारों में अहम भूमिका निभाई । मित्तल पर रणनीति के साथ ही पार्टी को आर्थिक रूप से मजबूत करने की भी जिम्मेदारी रही । जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

चंद्रराज सिंघवी- राजे की चुनावी रणनीति का प्रमुख चेहरा माने जाने वाले सिंघवी को प्रदेश में वसुंधरा का चाणक्य कहा जाता था। लेकिन बाद में नाराज हुए सिंघवी ने अगले चुनाव में बगावत कर दी और धीरे-धीरे उनका राजनीतिक वजूद ही खत्म हो गया ।

ललित मोदी- 2003 के विधानसभा चुनावों में ललित मोदी भले ही मैदान में खुलकर सामने नहीं थे लेकिन वसुंधरा राजे की रणनीति में अहम भूमिका निभाते थे। ललित मोदी ने पर्दे के पीछे रहकर ही वसुंधरा को चुनावी नैया पार लगाने में प्रमुख भूमिका अदा की । जिसके बाद वसुंधरा राजे के सत्ता में आते ही उन्हें नंबर 2 की पोजिशन में माना जाता था। लेकिन कई विवादों के बाद ललित मोदी को वसुंधरा का साथ और राजस्थान की राजनीति से दूर होना पड़ा ।

एस एन गुप्ता – वसुंधरा राजे के खास विश्वसनीय माने जाने वाले गुप्ता उनकी चुनावी गणित के साथ ही पैसों का प्रबंध भी देखते थे।

2013 में बदले रणनीतिकार –

भूपेन्द्र यादव – सुराज संकल्प यात्रा के रोडमैप से लेकर आमजनता में प्रचार की कवायद सीधे तौर पर भूपेन्द्र यादव संभाल रहे थे। यादव वसुंधरा राजे के काफी करीबी माने जाते रहे हैं। यात्रा का प्रबंधन भूपेन्द्र यादव के हाथ में ही रहा।

राजेन्द्र राठौड़ – 2013 में सुराज संकल्प यात्रा के प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाने वाले राठौड़ वसुंधरा राजे के करीबी रहे हैं और सरकार में भी अहम पदों पर रहे।

औंकार सिंह लखावत- राजस्थान की राजनीति में पुरानी हैसियत रखने वाले औंकार सिंह लखावत वसुंधरा राजे के विश्वसनीय माने जाते हैं। साथ ही सुराज संकल्प यात्रा और 2013 के चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे।

कालीचरण सराफ- वैश्य मतदाताओं में अपनी पैठ रखने वाले सराफ 2013 में वसुंधरा राजे की टीम का प्रमुख हिस्सा रहे और यात्रा के प्रबंधन के साथ ही चुनावों में व्यापारी वर्ग से पार्टी के आर्थिक तंत्र को मजबूत करने में कामयाब रहे ।

किरण माहेश्वरी – मेवाड़ की राजनीति में पकड़ रखने वाली किरण माहेश्वरी राजे की टीम का प्रमुख हिस्सा रही हैं। साथ ही सुराज संकल्प यात्रा के दौरान भी राजे के लिए मेवाड़ इलाके में प्रमुख जिम्मेदारी निभाई ।