फोकस भारत। पत्रकारों की हालत दिनों दिन कितनी दयनीय होती जा रही है ये होली के दिन हमारे पत्रकार साथी बड़े भाई मनोज राठौड़ के निधन की खबर से पता चलता है । एक ऐसा साथी जो कैमरे और कलम से हमेशा लोगों की समस्याओं से जुझता था। एक दिन अपनी ही परेशानी से हार गया और अपनों से ही अपनी परेशानी साझा करने के बजाय खुद ने मौत को गले लगाना उचित समझा । आदरणीय मनोज भाई आपके जाने की खबर ने हम सब की संवेदनहीनता को भी उजागर कर दिया है । अब हम आपके उस कैमरे और कलम का क्या करेंगे,मुझे नहीं पता,जिससे आप ने कई लोगों की परेशानियों को लेकर आवाज उठाई थी, कई आंदोलन और जलसों से लेकर कई मौकों को आपकी खींची तस्वीरों ने ही देश को परिचित करवाया था । आपकी काबिलियत ही थी की कई लोग आपके सेवा कार्य के दौरान आपके फोटो जर्नलिस्ट होने और संवाददाता होने में फर्क नहीं कर पाए थे। आप की खबरे कई बार हमने बाई लाइन पढ़ी है और कई फोटो को समाचारों के मुख्य पृष्ठ पर स्थान पाते हमने देखा है। ना ही उस गुड़िया को पता है जिसे आप पीछे अकेला छोड़ कर गए हैं ।
हम उसे क्या संस्कार देंगे हमें नहीं पता। हम पत्रकार होने के नाते एक ही जमात और एक परिवार होने का दावा तो करते हैं लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर हैं । सच तो ये है कि अब पत्रकारिता में एक परिवार का कोई स्थान ही नहीं बचा है । सब वोटों और वर्चस्व की राजनीति में हमने कुर्बान कर दिया है। चापलूसी,बेइमानी और जातिवाद ने हमारी रगो में स्थाई बसेरा पा लिया है । ऐसे दौर में आपका चले जाना ही उचित था। मुझे नहीं पता की कितने ही मनोज ऐसे दौर में चले जाएंगे । मैं आपको किसी जाति में नहीं बांध रहा हूं लेकिन ये ही सच है कि हमने प्रेस क्लब से लेकर अखबारों और मीडिया चैनल्स में जातिगत ग्रुप बना लिए हैं । इस बात से दूखी हूं कि जिसे आप परिवार समझते थे उन्होंने आपके शोक संदेशों को मात्र ग्रुप का हिस्सा बनाकर शेयर किया और होली मनाने में मशगूल हो गए। क्या परिवार का कोई सदस्य चले जाने पर ऐसा होता है। मैं सोच रहा था कि आखिर हम क्यों इन प्रेस क्लब का हिस्सा होते हैं , क्यों वोट देने और एक दूसरे की समस्याओं को साथ मिलकर लड़ने की बात करते हैं । जबकि अंदर से हम सब जानते हैं कि प्रेस क्लब सस्ती शराब और बैठकर फालतू की चर्चाओं के अलावा हमारे क्या काम आ रहे हैं । मुझे लगता है कि इन क्लबों में संवाद केन्द्र होना चाहिए जहां किसी भी पत्रकार की कोई समस्या हो तो वो अपनों को बता सकें और हम सब मिलकर संवाद के जरिए उनका हल निकाल सकें। ताकि फिर किसी मनोज को यहां से ऐसे नहीं जाना पड़े। सादर श्रद्धांजलि …
हेमंत कुमार ( लेखक जाने-माने टीवी एंकर है)