फोकस भारत । राजस्थान के सिरोही जिले में गरासिया जनजाति है, जिसको “कुंवारे देश के आदिवासी” कहा जाता है। क्योंकि इनकी मुख्य विशेषता, परम्परा है। इनके प्रचलित मेलों में अविवाहित लड़के लड़कियां एक दूसरे को पसंद कर, भगाकर छोटी उम्र में ही वैवाहिक जीवन यापन करने लगते हैं।

यह औपचारिक और पूर्ण रिती रिवाज से विवाह तब करते हैं, जब सक्षम हो जाते हैं। काफी उम्र गुजर जाती है कई बार बुढ़ापे में भी तब तक इनके बच्चें भी बड़े हो जाते वो भी अपने माता-पिता के विवाह में सम्मिलित होते है । दरअसल मेलें धार्मिक आध्यात्मिक सरोकार से जुड़े हुए हैं। यह यहां मृतकों की अस्थि विसर्जन करते हैं।
इसलिए इनके जीवन में मेलों का बहुत बड़ा महत्व है। पूरे क्षेत्र में प्रतिवर्ष कई मेलें भरते हैं। जहां भारी संख्या में गरासिया सम्मिलित होते हैं। अस्सी फीसदी संख्या अविवाहित युवाओं की होती है। यहां युवतियां पूर्ण सज-धज के आती है। बहुरगींन वस्त्र, आभूषणों से सज्जीत होती है। और जीवन साथी का चयन करती हैं।

कार्तिक पूर्णिमा पर माउंट आबू नक्की झील पर मेला भरता है। मुझे जाने का अवसर मिला। मेलें में युवक पसंद की युवती को प्रेम प्रस्ताव रखते हुए छेड़ता रहेगा। युवती का सकारात्मक रवैया लगता है तो पूरे मेलें में युवती का पीछा करता रहेगा, यहां प्रस्ताव युवक ही रखता है और युवती की सहमति के बाद अन्तत मेंले से ही भाग जाते हैं।
यहां छेड़छाड़ से मतलब समझें, युवक,युवती के पास जाकर बाल,गाल, हाथ, कमर में से पकड़कर रोमांस करना इत्यादि और बेझिझक से प्रेम प्रस्ताव रखना। सामान्यतः युवती और उसके घर के सदस्यों को कोई आपत्ति नहीं होगी । युवती जवाब देकर चलती बनेगी और अन्य लोग दर्शक बनें ठहाके लगाएंगे।

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है, गंधर्व विवाह परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना ‘गंधर्व विवाह’ कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से ‘गंधर्व विवाह’ किया था। उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम “भारतवर्ष” बना। इसी प्रकार गरासिया जनजाति में यह कह सकते हैं। सामूहिक गंधर्व विवाह करने के ही बहुत बड़े स्थान निर्धारित है। क्योंकि आदिवासी ही मूल भारतीय हैं।
यह मान लो कि एक युवती को पूरे मेले में कई युवकों द्वारा छेडा जाता है। बड़ा रोचक दृश्य होता है । जहां भी नजर पड़ी वहां रोमांस भरी हरकते देख, मैं हक्का-बक्का रह गया। होना ही था,फिर भी यहां युवती की सहमति होना अतिआवश्यक है।

कथित वैदिक काल में भी कन्या को स्वयंवर विवाह प्रथा समाज के चारों वर्णों में प्रचलित और विवाह का प्रारूप था। रामायण और महाभारत काल में भी यह प्रथा राजन्य वर्ग में प्रचलित थी, परन्तु इसका रूप कुछ संकुचित हो गया था। राजन्य कन्या पति का वरण स्वयंवर में करती थी परंतु यह समाज द्वारा मान्यता प्रदान करने के हेतु थी। कन्या को पति के वरण में स्वतंत्रता न थी। पिता की शर्तों के अनुसार पूर्ण योग्यता प्राप्त व्यक्ति ही चुना जा सकता था।
हरकतों से उस समय मुझे पता नहीं क्यूं, फेसबुक का “पोक्ड “ओप्सन बार -बार याद आ रहा था…सोचा. मैंने तो उसका भी प्रयोग नहीं किया कभी।
मेरा एक सवाल और उन तमाम बुद्धिजीवी समाज सेवकों की और था। जो आजकल विभिन्न समाजों में अविवाहित युवक युवतियों के लिए परिचय सम्मेलन आयोजित करते हैं। यह सम्मेलन अब आयोजित होने लगे हैं, क्यू जरूरत पड़ी? … वो कितने सफल होते है? पता नहीं, पर यहां आदिवासी मेलें में तो इनके संबंध जुड़ते मैंने खुद देखे। यह कहना कत्तई अतिश्योक्ति नहीं होगी की समकालीन दौर में चलित परिचय सम्मेलन का उपजीव्य आदिवासी संस्कृति की देन है।
संदीप कुमार मेघवाल,चित्रकार एवं शोधार्थी दृश्य कला( लेखक)