घुमंतू परिवारों के अधिकारों और विकास के लड़ रही है ये लड़की

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फोकस भारत। एक युवा नारीशक्ति ऐसे समुदाय के लिए संघर्ष कर रही है, जिनकी न सरकार है और न ठिकाना है, घुमंतू जातियों की बस्तियों में वोट बैंक कम होने की वजह से सरकारी सुविधायो से महरूम है , लेकिन अपनी दृढ इच्छाशक्ति से रचना ढाका उनकी जिंदगी मे बदलाव ला रही है, आईए जानते है ‘रचना ढाका’ की जिंदगी के अनछुए पहलू।

बाबा और नाना की सीख पर आगे बढ़ी
सीकर के लक्ष्मणगढ के गांव बासनी(बेरास) में जन्मी रचना ढ़ाका घुमंतू समुदाय के विकास के लिए प्रयासरत है। रचना बताती है कि बाबा सुल्तान सिंह ढाका के समाजसेवा के कार्यो को बचपन से ही देखते हुए मैं बड़ी हुई । मुझे लगता था कि बाबा जैसा ही कुछ काम करना है। नानाजी हमेशा बोलते थे कि बेटा पढ़ाई तभी सार्थक है जब वो किसी के काम आ सके । बस ये बात हमेशा मेरे जेहन में थी। रचना के पैरेंट्स दोनों टीचर हैं.। रचना कहती है कि बाबा अपना वेतन समाज सेवा में लगा देते थे लेकिन मां ने कभी कुछ नही कहा। सब कुछ खुदने मैनेज किया।


घुमंतू परिवारों की बनी आवाज

रचना ने लखनऊ से LLB की तो मुंबई के Tata Institute of Social Sciences से LLM किया। लेकिन रचना को वकालत नहीं करनी थी उनके मन में कुछ ओऱ चल रहा था । रचना कहती है कि मेरे दोस्तो ने जब मेरे काम को समझा तो मुझे कहा कि TISS Mumbai से जुड़ो । ये तुम्हारे मन के मुताबिक काम होगा। फिर रचना मुम्बई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोश्यल साइंस की प्रोग्राम फैलो ओफिसर बनी। इसके बाद से पिछले साढे 3 सालों से बंजारा, बावरिया आदि घुमंतू एंव वंचित जनजाति के लोगो के अधिकारों के लिए आवाज उठा रही है।

बेटी बचाओं एवं बेटी पढ़ाओ की ब्रांड एम्बेसडर

दूसरे समुदाय से होने के बावजूद घुमंतू समुदाय के दर्द , तकलीफो को समझने औऱ उनके अधिकारों -विकास के लिए लगातार उल्लेखनीय कार्य करने के लिए रचना को अखिल भारतीय विमुक्त एंव घुमंतू जनजाति वेलफेयर संस्थान की प्रदेश महिला(राजस्थान) उपाध्यक्ष बनाया है। इसके अलावा रचना को बेटी बचाओं एवं बेटी पढ़ाओ की ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है।

अब सवाल करने लगे है

रचना अपने गांव के अलावा सीकर जिले में बसे हुए घुमन्तु परिवारों के साथ पिछले 3 वर्षों से जुडी हुई हैं.। घुमंतू समुदाय की सामाजिक -आर्थिक समस्याओं के लिए लगभग हर रोज किसी न किसी कार्यालय का दरवाजा खटखटाती है.। किसी को पुलिस ने गिरफ्तार कर दिया तो किसी की पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है, किसी का कोई ‘कार्ड’ नहीं है तो किसी के पास पढने की सुविधा नहीं है. किसी की झोंपड़ी उखाड़ने JCB आ गई है ! इनके फंडामेंटल राइट्स जो किसी भी इंसान के लिए जीने के लिए जरुरी है उनके लिए रचना लड़ रही है। रचना ने 90 घुमंतू परिवारों को पट्टे दिलवाए है, इसके अलावा भामाशाह कार्ड, बीपीएल कार्ड बनवाने से लेकर एक दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव भी जगाया है। रचना कहती है कि मेरे इस प्रयास से सबसे बड़ी उपलब्धि है कि समुदाय के लोग सवाल करने लगे है। मुझसे भी सवाल करते है ऐसा क्यो बाईजी ? मुझे अच्छा लगता है कि वो लोग मुझे भी सवाल करते है, उनके मन भी अपने अधिकारो के प्रति जागरुकता आ रही है।

घुमंतू परिवार अधिकारों को पहचाने

रचना बताती है कि महिलाओ का साथ मिल रहा है, समुदाय की महिलाए अपने परिवार को समझा रही है। बाल -विवाह सही नही है ऐसी जागृति भी अब समुदाय में दिख रही है। लेकिन लड़कियों को अभी भी पढ़ाने में कम ध्यान है। स्कूल से ज्यादा से ज्यादा समुदाय की लड़कियों को जोडने का प्रयास कर रही हूं। गांव में लीगल, मेडिकल, कैंंप भी लगाए है। ताकि लोगो को सरकार की योजनाओ के साथ अपने अधिकारो के बारे में मालूम चल सके। अब घुमंतू समुदाय भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो रहा है। कम्यूनिकेशन गेप खत्म हो रहा है। समाज के लोग उनकी मदद के लिए आगे आ रहे है। घुमंतू परिवारो के बच्चो ं को स्पोर्टस से जोडा जा रहा है, इसके अलावा उन्हें खेल खेल के साथ पढ़ाया जा रहा है। जिससे स्कूल में बच्चों का रेश्यो बढ़ा है।

अपनी आवाज खुद उठाए

रचना कहती है कि इस समुदाय के बच्चे अपने पैरो पर खड़े हो गए। उच्च शिक्षा हासिल करके किसी उच्चे पद पर बैठ जाएंगे तो समुदाय में जागृति अपने आप आ जाएगी। रचना बताती है कि मैं नही चाहती कि मैं जिंदगी भर इनके लिए काम करती रहूं क्योंकि ऐसा हुआ तो हमेशा मुझ पर ये लोग निर्भर रहेंगे,, मैं चाहती हूं कि इनमें अपने अधिकारों के प्रति इतनी जागृति आ जाए कि ये लोग खुद ही अपनी आवाज उठाए।