फोकस भारत। स्त्री जब से अपने स्त्री रूप में पृथ्वी पर है मासिक धर्म उसके जीवन की सहज निवृति है. स्त्री शरीर में मासिक धर्म की शुरुआत इस बात की और इंगित करती है कि अब उसका शरीर माँ बनने की योग्यता को प्राप्त कर रहा है. मासिक धर्म रजोधर्म,रजस्वला, पीरियड्स, मेंसुलेशन, जैसे अनेक नामों के अलावा क्षेत्र विशेषों में अलग – अलग नामों से जाना जाता है. यह स्त्रियों के शरीर से जुड़ा है और स्त्रियों के शरीर से, व्यवहार से जुड़ी हर चीज को हमारे समाज में ही नहीं दुनिया भर में दोयम दर्ज़ा दिया जाता रहा है. हमारे देश के कई गाँवों में तो इसे इतना गुप्त रखा जाता है कि इसका नाम तक नहीं लिया जाता और इसे संकेतों की भाषा जैसे पट्टे पर बैठी है, काम करने की नहीं है जैसेसंकेतों से संकेता जाता है. जब किसी चीज को हम गन्दा, लज्जाजनक या शर्मनाक ठहरा देते हैं तब उसकी भयावहता और कष्टों पर बात करना बेमानी हो जाता है. इनदिनों को महिला के अपवित्र या बुरे दिनों के रूप में देखा जाता रहा है इसलिए उसे रसोई में खाना बनाने, मटके के हाथ लगाने, अचार, पापड़ बनाने और उन्हें छूनेजैसे कामों से दूर रखा जाता है लेकिन इन दिनों में इससे अधिक शारीरिक श्रम वाले कामों कोकरवाने में कोईकोताही नहीं बरती जाती है. कईदूरदराज गाँवों में महिलाएं दूर – दूर से पानी लाने, खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करते तो शहरों में हर दिन मजदूरी बेलदारी करते देखी जा सकती हैं. इसका मतलब हर दिन काम किया जा सकता है और उसका काम पर कोई कोई दुष्परिणाम नहीं होता है।
क्या है मासिक धर्म ?
प्रत्येक बालिका जन्म के समय लाखों अण्डों के साथ जन्म लेती है धीरे – धीरे इन अण्डों की संख्या कम होती जाती है. किशोरीसे युवा बनती लगभग 13 – 15 वर्ष की आयुसे45 – 50वर्ष की आयु तक प्रत्येक लड़की/ महिला के शरीर मेंएक औसत अंडा करीब 24 घंटे जीवित रहता है. गर्भाधान के लिए डिम्ब को इसी समयावधि में शुक्राणु द्वारा निषेचित किए जाने की आवश्यकता होती है. यदि डिम्ब गर्भाशय में जाते हुए स्वस्थ शुक्राणु से मिल जाता है तो गर्भाशय में गर्भ बनने लगता है औरयदि ऐसा नहीं हो पाता है तो अंडे की यात्रा गर्भाशय तक जा कर समाप्त हो जाती है और उसकी दीवारें / पर्तें टूटकर बाहर गिरने लगती हैं. जो कि रक्त / खून के रूप में योनी से बाहर धीमे – धीमे 3 से 5 दिनों तक रिसती रहतीहैं. इस समय महिला को शरीर में हल्का दर्द भी होता है. तेज दर्द होने पर चिकित्सक से परामर्शली जानी चाहिए. इस समय शरीर से खूनजाता है इसलिए शरीर में कमजोरी महसूस होने लगती है. एक आम स्त्री शरीर सेउसके जीवनकाल में मासिक धर्म के द्वारा लगभग 420 बाररक्त जाता है. ऐसे में शरीर में खून की कमी हो जाती है. प्रसव के दौरान भी महिला के शरीर से रक्त जाता हैतोशरीर में खून की मात्रा कम हो जाती है.आमतौर पर महिलाएं पुरुषों के मुकाबले पौष्टिक आहार भी कम लेती हैं. रात का बचा हुआ खानाया कम खा कर रह जाने जैसी आदतों के चलते उनके शरीर में लौह तत्वों की कमी हो जाती है और वे रक्ताल्पता( एनेमिया) की शिकार हो जाती हैं. महिलाओं में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12. 5आवश्यक है लेकिन लगभग 2 से 3 प्रतिशत ही महिलाओं में हीमोग्लोबिन की उचित मात्रा पाई जाती है.एनेमिया के चलते वे अनेक बिमारियों की शिकार तो बनती ही हैं जिसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है
एकअध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 15 से 49 वर्ष की 80 करोड़ महिलाएँ पीरियड्स में होती हैं और दुनिया की सवा अरब महिलाओं को पीरियड्स के दौरान शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं होती. यू एन का अनुमान है कि 10 में 1लड़की पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जा पाती और फिर धीरे – धीरे उसका स्कूल छूट जाता है. इसलिएमासिक धर्म को मूत्र या मलत्याग जितना ही सहजतासे लेतेहुएएक गंभीर मुददे की तरह लिए जाने की ज़रुरत है।
तू बोलेगी, मुँह खोलेगी, तब ही तो ज़माना बदलेगा …… ये लाइन कमला भसीन की है जो महिलाओं को चुप्पी तोड़ने और बोलने को कहती है। शहरी संस्कृति की यह मांग है कि रुकावटों को पार पाते हुए तेज चला जाए. बेड़ियों को तड़का– तड़का कर तोड़ा जाए. संयुक्त परिवारों में महिलाएं घर में इससे सम्बंधित बनाई वर्जनाओं का पालन कर पाती थीं लेकिन शहरी जीवन ने इन वर्जनाओं को वैसे ही तोड़ा है जैसे पर्दा प्रथा. आज यदि कोई लड़की स्कूल या कॉलेज में पढ़ रही है तोपरीक्षा/ एग्जाम देने वो तमाम चौराहों को पार कर के एग्जाम देने जाएगी ही.यहाँ चौराहे पर पैर न पड़ जाए जैसी वर्जना को तोड़ाजाना लाज़िमी है. एकल परिवार या अकेली कामकाजी महिला यदि शहर में रहती है तो वह मासिक धर्म के दिनों में भी अपने परिवार या अपने लिए खाना पकाएगी ही.यह समय की मांग है. इसका मतलब है इस स्थिति से जिस प्रकार बर्ताव किया जाता है वह मात्र एक कुप्रथा की तरह ही है।
वर्जनाएँ तोड़कर तो देखें –
इसके लिए बस हमें वर्जनाओंको तोड़ने भर का साहस जुटाना पड़ेगा और फिर ये बेड़ियों को तोड़ने की बात यहीं तक सीमित नहीं रहेगी. वह बिल्ली के रास्ता काटने और तमाम टोटकों की धज्जियां उड़ाने का साहस भी जुटा देगी.सवाल उठाने का साहस भर देगी. अधिकारों के लिए लड़ने की हिम्मत दे देगी. इसके उल्ट यदि देखें तो महिलाओं की हर चीज़ को महत्वहीन करार दिया गया जिससे उसकी परिवारों और समाज में दोयम दर्ज़े की स्थिति हो गई. उनके मुद्दों को गौण रखा गया इसलिए आज उन्हें बराबरी के हक़ के लिए भी लड़ना पड़ रहा है जो कि प्राकृतिक रूप से समान हैं और थे.वर्जनाओं को तोड़ना हमें साहसी बनाता है हममें आत्मविश्वास भरता है।
लगभग 20 – 25 वर्ष पहले जहाँ मासिक धर्म पर महिलाएं मौन साधे रहती थीं वहीं आज महिलाएं अपने बेटों सेइस स्थिति पर बात कर पा रही हैं और बेटियाँ अपने पिता को घर के सामान की सूची में सेनेट्री नेपकिन को दर्ज़ करवा रही हैं. वर्तमान समय में इसविषयपर चिकित्सकीयदृष्टि से ही नहीं सामाजिक दृष्टि से भी लिखा जाने लगा है. इस स्थिति की सहज स्वीकार्यता बनाते हुए जगह – जगहबड़ी – बड़ी कार्यशालाएं औरछोटे – छोटे समूहों में संवाद किए जा रहे हैं. मासिक धर्म की विभिन्न अवस्थाओं पर बात करते हुए रजोनिवृति तक पर बात की जा रही है जिससे स्त्रीशरीर पर पड़ने वाले इसके प्रभावों / व्यवहारोंको भली – भांति समझा जा सके।
मासिक धर्म एक सहज मुद्दा –
यूँ तो कई कंपनियां वर्षों से सेनेटरी नेप्किन्स बना रही हैं.इसमें कोई ऐसी पेचीदगी नहीं है जिसे स्थानीय स्तर पर नहीं बनाया जा सके. इस मुद्दे को समाज में आज भी सहजता से नहीं लिया जाता है इसलिए जब भी पुरुष इसे स्थानीय स्तर पर बनाने का कार्य शुरू करते हैं तो उनको भी उतनी ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जितना कि महिलाओं को पुरुषों के लिए समाज द्वारा तय किए गए कामों को करने में होती है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय संस्थाओं और समूहों द्वारा सेनेट्री नेप्किंस बनाने की छोटी– छोटी इकाइयों को महिलाओं के लिए मूलभूत आवश्यकता की वस्तु के रूप में स्वीकार करते हुए को स्थापित किया जा रहा है. हाल ही में सेनेटरी नेप्किंस पर टेक्स लगाने को ले कर महिलाओं ने अपनी आवाज़ बुलंद की और इस दृष्टि से देखने की और इशारा किया कि यह महिलाओं की नैसर्गिक ज़रूरत है. यदि महिलाएं गरीबी के चलते इनका प्रयोग नहीं कर पाती हैं तो वे शारीरिक असुविधा के साथ – साथ आवश्यक साफ़ – सफाई से भी वंचित रहेंगी ऐसे में वे अनेक यौन रोगों से घिर सकती हैं. महिलाओं या पुरुषों की शारीरिक बनावट, उनमें समय – समय पर होने वाले बदलावों को समझते हुए ही उनकी स्थिति और व्यवहारों के प्रति संवेदनशील हुआ जा सकता है और यही उन्हें बेहतर समझने का स्वथ्य तरीका है।

अनुपमा तिवाड़ी,लेखिका