मिलिए देश की पहली ‘मरीन पायलट’ से, जो समुद्र में जहाजों को दिखाती है रास्ता

साभार -फेसबुक
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फोकस भारत। समुद्र की लहरों से टकराते हुए जहाज को वो पानी में रास्ता दिखाती हैं। समुद्र के बीच संकरे, गहरे रास्तों से वह जहाज़ को निकालकर ले जाती हैं। हालांकि, वो जहाज नहीं चलातीं पर जहाज उनके इशारे पर जरूर चलता है। ये हैं रेशमा नीलोफर नाहा जो भारत की पहली मरीन पायलट हैं। दरअसल रेशमा जहाज़ों को बंदरगाह तक पहुंचाने और फिर समुद्र तक ले जाने का हुनर बखूबी जानती हैं। उनकी पानी में रास्तों से दोस्ती हो चुकी है और मौसम के मिजाज को बारीकी से समझती हैं।

मरीन पायलट ?
पायलट शब्द से आमतौर पर जहन में हवाई जहाज उड़ाने वाले किसी शख़्स की तस्वीर उभर आती है। लेकिन, मरीन पायलट बिल्कुल अलग होता है> मरीन पायलट बंदरगाह से लेकर समुद्र की एक खास सीमा तक हर रास्ते, स्थितियों और खतरों की जानकारी रखता है।उसके​ बिना किसी जहाज़ का बंदरगाह तक पहुंच पाना मुश्किल हो सकता है। ये मालवाहक जहाज़ों को बंदरगाह पर लंगर डालने और वहां से समुद्र में बंदरगाह की सीमा तक छोड़ने का काम करता है। रेशमा कहती है कि इस बंदरगाह पर नेवी, कोस्ट गार्ड के जहाज़, कार्गो और निजी कंपनियों के मालवाहक जहाज़ आते-जाते रहते हैं। मरीन पायलट मर्चेंट नेवी का हिस्सा है। रेशमा जहाज़रानी मंत्रालय के तहत कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर स्थायी तौर पर नियुक्त हैं।

रेशमा का सफर
रेशमा कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर मरीन पायलट के तौर पर काम करती हैं। वह यहां 6 साल से अधिक समय से हैं। वह इस साल ट्रेनिंग पूरी करके मरीन पायलट बन गई हैं। अपने काम के बारे में रेशमा ने बीबीसी को बताया ”पहली मरीन पायलट होने से खुशी भी होती है और ये काफी चुनौती भरा भी लगता है। मैं यहां कई सालों से प्रशिक्षण ले रही हूं और अपने काम से वाकिफ भी हूं लेकिन जब पूरा जहाज़ आपके भरोसे आगे बढ़ता है तो ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ जाती हैं।” रेशमा चेन्नई की रहने वाली हैं। उन्होंने बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रांची से संबद्ध एक संस्थान से बीई मरीन टेक्नोलॉजी की डिग्री ली है। इसके बाद रेशमा ने एक कंटेनर शिप्स कंपनी ‘मर्स्क’ में दो साल काम किया और सेलर सेकेंड ऑफिसर का लाइसेंस लिया। फिर कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर मरीन पायलट के लिए आवेदन किया।