फोकस भारत। 15 अप्रैल 1918 को जन्मे हसरत जयपुरी का मूल नाम इकबाल हुसैन था । इकबाल ने जयपुर में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद अपने दादा फिदा हुसैन से उर्दू और फारसी की तालीम हासिल की। हसरत जयपुरी को फिल्मों के टाइटल पर गीत लिखने में उन्हें महारत हासिल थी । उनके लिखे टाइटल गीतों ने कई फिल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। हसरत साहब ने फिल्मों में खूब गीत लिखे। गीतों के अलावा उन्होंने ग़ज़लें भी लिखी, शेर भी कहे। हसरत जयपुरी के कुछ शेर-
दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे
हर रस्म-ए-मोहब्बत को मिटाने के लिए आ
वो सबा महकी महकी
ख़ुदा जाने किस-किस की ये जान लेगी
वो क़ातिल अदा वो सबा महकी महकी
हम रातों को उठ उठ के जिन के लिए रोते हैं
वो ग़ैर की बांहों में आराम से सोते हैं
प्रेम के पुजारी
हसरत जयपुरी को शायरी विरासत में मिली थी। उनके नाना फ़िदा हुसैन फ़िदा मशहूर शायर थे। लेकिन शेरो-शायरी को अपनी महबूबा की तरह अपने साथ टिकाये रखने के लिए हसरत को जो जद्दोजहद करनी पड़ी वह हर एक के लिए मुमकिन न थी। वह 1940 का दौर था। कई अन्य महत्वपूर्ण गीतकारों, संगीतकारों और फिल्मकारों की तरह हसरत जयपुरी का भी आगमन फिल्म जगत में हुआ था। ‘बरसात’ फिल्म के बाद का वह कालखंड हसरत जयपुरी की जिंदगी का स्वर्णिम काल था जब उन्होंने ‘आह’, ‘अराउंड द वर्ल्ड’, ‘श्री 420’ और ‘मेरा नाम जोकर’ के गीतों से धूम मचा दी थी। दरअसल एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिट्टी के खिलौने बेचने वाले से फैक्ट्री में मजदूरी करने और इस मजदूरी से लेकर आरके बैनर तले आने तक का हसरत जयपुरी का सफ़र बड़ा दिलचस्प है। अहसानमंदी और गैरतमंदी हसरत जयपुरी के व्यक्तित्व के दो सबसे मजबूत पक्ष थे। वे राज कपूर से लेकर अपने जयपुर के बालपन के मित्रों तक के ताउम्र आभारी रहे। राजकपूर ने उन्हें फिल्मों में पहला ब्रेक दिया था तो बाकी दोस्तों ने इससे पहले उनके गुरबत के दिनों में मुंबई आने के किराए से लेकर जूते-चप्पल और कपड़ों तक की व्यवस्था की थी।
ऐसे मिला फिल्मों में मौका
पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में हसरत जयपुरी को अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते हुए सुना था। इसी के बाद उन्होंने राज कपूर को उनका नाम सुझाया था। फिल्म गीतकार होने से बहुत पहले हसरत एक मुकम्मल शायर थे। और उनकी यही खूबी उनको प्रतिष्ठित आरके बैनर में शामिल करने का सबब बनी। पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में उन्हें अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते सुन लिया था। इसे उन्होंने अपने साथ फुटपाथ पर रात बिताने वाले मित्र की मृत्यु पर लिखा था। उन्होंने ही राज कपूर को मशविरा दिया कि हसरत बहुत अच्छा गीत लिखते हैं और वे चाहें तो उन्हें आरके बैनर में शामिल कर सकते हैं। इसके बाद राज कपूर ने उनकी शायरी सुनी। फिर उस लोकगीत पर आधारित धुन शंकर जयकिशन के माध्यम से उन्हें सुनवाई जिसके बोल थे – ‘अमुवा का पेड़ है, वही मुंडेर है। आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है।’ धुन में बंध लिखने की हसरत जयपुरी की यात्रा यहीं से शुरू हुई। इसी तर्ज पर उनका पहला गीत तैयार हुआ – ‘जिया बेकरार है, छाई बहार है, आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है’
रुमानियत उनका सहज स्वभाव
रूमानियत उनका सहज स्वभाव थी। फिल्मी दुनिया में हसरत जयपुरी के बारे में एक धारणा बन गई थी वे जिस फिल्म का शीर्षक गीत लिखेंगे उसका बेशुमार सफल होना तय है। यही नहीं जो शब्द अब तक कहीं अस्तित्व ही नहीं रखते थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर हसरत जयपुरी ने न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोल दी। क्या हममें से कोई, ‘रम्मैया वस्तावैया’ या फिर ‘शाहेखुबा’ या ‘जाने-जनाना’ का कोई मुकम्मल अर्थ जानता है? पर गीतों में ये शब्द सार्थक और सजीव हो जाते हैं। फिल्मों के लिए शीर्षक गीत लिखना सबसे कठिन माना जाता है पर हसरत जयपुरी ने इस मुश्किल को कुछ इस सादगी से अंजाम दिया। ऐसे गीतों का एक लंबा सिलसिला था जिसमें – दीवाना मुझको लोग कहें (दीवाना), दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), रात और दिन दिया जले (रात और दिन), एक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), दो जासूस करें महसूस (दो जासूस), एन ईवनिंग इन पेरिस (एन इवनिंग इन पेरिस) जैसे न जाने कितने गीत शामिल थे।
महान गीतकार औऱ शायर हसरत जयपुरी के जन्मदिन पर फोकस भारत सलाम और नमन