फोकस भारत। सियासत और सरकार जिनके लिए होती है कई बार उसी आवाम की आवाज को दरकिनार कर महज अपने-अपने हित साधने लग जाती है।इसी की बानगी है राजधानी जयपुर से करीब 20 किमी दूरी पर ही बसा नींदड़ गांव, जहां किसान अपनी खेती की भूमि को बचाने और उचित मुआवजे को लेकर ही कई सालों से सरकार से गुहार लगा रहे थे। जब किसानों की आवाज हुक्मरानों तक नहीं पहुंची तो किसानों को जमीन समाधि सत्याग्रह का सहारा लेना पड़ा। हद तो तब हो गई जब जमीन में गड्डा खोदकर 2 अक्टूबर से अपनी मांगों को शासन तक पहुंचाने की आस में बैठा नींदड़ का किसान सरकार के आने की राह ही ताक रहा है लेकिन राजस्थान की सरकार को राजधानी से महज चंद किलोमीटर दूर भूखे प्यासे किसान की परेशानी समझने और सुनने का वक्त भी ना मिला। सचिवालय के गलियारों से लेकर पार्टियों के दफ्तर और मुख्यमंत्री व मंत्रियों के घर परिवार जब दिवाली की रोशनी में जगमगा कर शाही वैभव का बखान कर रहे थे। नींदड़ के अंधरे गड्डों में बैठा किसान राज और राम दोनों से आस लगाए भूखा बैठा रहा। लेकिन ना राम उन तक पहुंचे और ना ही राज। ये हम सब की विडंबना है कि हम सब अन्नदाता को भूखा छोड़ भगवान को भोग लगाने में ही व्यस्त रहे। सरकार के साथ ही विपक्ष भी इस पूरे मामले में मुर्दा ही साबित हुआ है। जो किसानों की आवाज को मुखरता के साथ सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचा पाए ऐसे विपक्ष को लोकतंत्र में क्या कहेंगे ये आप ही तय करें। सरकार ने लगता है जैसे अपने कान-आंख बंद कर लिए और अपनी जिम्मेदारी से विमुख हो विलासिता में लीन हो गई । ये स्थितियां किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक है।
आखिर सरकार को किसानों की समस्या सुनने में इतना वक्त क्यों लग रहा है। अगर सरकार नहीं चेती तो नींदड़ के किसानों के साथ ही सूबे के किसानों और आम आवाम का भरोसा सरकार से उठ जाएगा। लोगों की आवाज सुनने और उन पर अमल करने की जिम्मेदारी सरकार की है क्योंकि वह जनता की सरकार है। इसलिए सरकार को जल्द से जल्द नींदड़ के किसानों की समस्या का समाधान निकालना चाहिए।अगर नींदड़ के किसानों की आवाज कमजोर हुई तो ये सिर्फ किसानों की ही हार नहीं है ये लोकतंत्र की हार होगी। आशा है सरकार नींदड़ के किसानों की आवाज की गंभीरता को समझ कर कोई ठोस कदम उठाएगी, जिससे किसानों को उनका हक मिल पाएगा।
कविता नरुका,
सम्पादक, फोकस भारत
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