संपादकीय: पत्रकारों पर बढ़े हमले, विश्वास खोती पत्रकारिता ?

प्रतीकात्मक तस्वीर
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देश में लगातार पत्रकारों पर हमले बढ़ रहे हैं और पत्रकारिता अपना विश्वास खोती जा रही है। देश में भांड मीडिया,वैश्या, कुत्ते और दलाल पत्रकार जैसे शब्द सार्वजनिक रूप से प्रचलन में आना ही बताता है कि पत्रकारिता का स्तर कहां पहुंच गया है और पत्रकारों की समाज में क्या इमेज रह गई है। फिर भी हम सब आंखे मूंदे पत्रकार एकता जिंदाबाद के नारे लगाते हुए दिखते हैं। कलम पर खतरे के ये निशान आखिर क्यों है? मुद्दों और लोगों की समस्याओं के लिए लड़ने वाला पत्रकार आज सरकार और संगठनों की चापलूसी क्यों करने लग गया है। नेताओं और ब्यूरोक्रेट के साथ सेल्फी की जंग में हम इस पत्रकारिता के उसूल और जिम्मेदारियों को ताक पर रख कर झूठी शान में आगे बढ़ रहे हैं जो महज पत्रकारिता के लिए ही नहीं स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी घातक है। चापलूसी का ही नतीजा है कि हम पत्रकार सरकार और नेताओं से सवाल का हक खो चुके हैं ।
लगता है अब इस देश में पत्रकारों की जरूरत हमने खत्म कर दी है। ऐसे दौर में प्रेस क्लब अय्याशी और राजनीति के नए अड्डे बन गए हैं। सोचिए जब हम अपने लिए चंद सुविधाओं के लिए लाइन में लग कर नेताओं की जी हूजुरी कर के पहचान बनाने लगें है तो पत्रकारिता का क्या होगा? क्या आपके आसपास कोई ऐसा पत्रकार दिखता है जो अपनी कलम के लिए जाना जाता हो। चापलूसी में वरिष्ठ हो जाना पत्रकारिता नहीं है धारदार पत्रकारिता और बेहतर, निष्पक्ष रिपोर्टिंग ही हमें पत्रकार बनाती थी जो हमने खत्म कर ली है।
अफसोस की बात है कि अब हमारे इस पवित्र व्यवसाय में आधे से ज्यादा लोग तो व्यवसायी है जो पत्रकारिता कैसे करेंगे वे व्यवसाय ही कर सकते हैं। आप जानते हैं हर चैनल और अखबार को अब पत्रकारों की जरूरत से ज्यादा व्यवसायियों की ही जरूरत है। ये जरूरत पैदा करने वाले भी तो हम ही है। फिर जब पत्रकार पिटता है तो घड़ियाली आंसू क्यों बहाए जाए। पिटने दीजिए लेकिन ये जरूर ध्यान रखिए आज किसी और का नंबर है कल किसी और का और हो सकता है परसों हमारा भी आएगा। हम क्यों हर रोज बिक रहे हैं और क्यों हमारा जमीर इतना सस्ता हो गया है कि हर कोई खरीद रहा है। हम खुद भ्रष्टाचार के सबसे बड़े मानक बन कर उभर रहे हैं। एक दूसरे की टांग खिंचाई में हम सारे पैमाने तोड़ चुके हैं। लिहाजा आग अगर पत्रकार का सबसे दुश्मन कोई है तो वो है खूद पत्रकार।
ये हम सब के लिए चिंता का कारण है। लेकिन इन सबमें हमारी राजनीति,जनता, और खुद पत्रकार ही जिम्मेदार है। पूरे मीडिया जगत की विश्वसनीयता खतरे के निशान से नीचे चली गई है। इस पर चिंतन नहीं हो रहा है। पत्रकारों के लिए भी ये समय खुद पर विचार करने का है कि आखिर मीडिया की विश्वसनीयता क्यों गिरती जा रही है। रात को पव्वा पीकर सोने वाला पत्रकार अगर सुबह शराब बंदी की खबर चलाएगा तो सोचिए उस खबर के क्या मायने होंगे। राजधानी जयपुर में एक निजी अस्पताल में महिला पत्रकार और कैमरामेन के साथ मारपीट और दैनिक भास्कर के फोटो जर्नलिस्ट की सरेआम बीजेपी कार्यकर्ताओं की ओर से पिटाई, इसके बाद क्या हुआ ये बताने की जरूरत नहीं है। क्या न्याय की लड़ाई कभी विज्ञापन पर जाकर खत्म हो सकती है और अगर हां तो जो चल रहा है उसे ही चलने दीजिए। हमारे अपने व्यवसाय में फैल रही गंदगी, आखिर क्यों पत्रकारों को सोचने पर मजबूर नहीं करती है ये ही सोचनीय है। जम्मू कश्मीर में एक निजी चैनल की महिला पत्रकार की पिटाई की घटना भी हमारे जेहन में है लेकिन हम दरकिनार कर आगे बढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं स्वतंत्रता,समानता और सच्चाई का प्रतीक समझा जाने वाला पत्रकार आज राजनीतिक दलों में उनके कार्यकर्ताओं से भी ज्यादा रंगा हुआ नजर आता हैं। कभी हम बीजेपी हो रहे हैं तो कभी कांग्रेसी,कभी दक्षिण पंथी तो कभी वामपंथी और फिर कभी चरमपंथी लेकिन हम पत्रकार तो नहीं हो रहे हैं। ये ही हमारी समस्या है जरा सोचिए रंग बदलने में तो हमने नेताओं और गिरगिट को भी पीछे छोड़ दिया है।
हम पत्रकार की पिटाई पर पैसे खाने की सोच रहे हैं और गरीब और मजलूमों पर हो रहे अत्याचारों की खबर में भी । हम दुष्कर्म और रेप जैसी घटनाओं पर तो वहशी दरिंदों से भी ज्यादा वहशीयत से पीड़िताओं को स्क्रीन पर जूम करके देखने लगे हैं। अगर ये ही हमारी सच्चाई है तो क्या हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं । जातिवाद तो हमारी और भी बड़ी समस्या है। याद किजिए वो समय जब हम कहते थे कि पत्रकारों की कोई जाति नहीं होती। महज पत्रकार होना ही एक जाति है जो हम सब को एक सूत्र में बांधने के अलावा हमारे काम की निष्पक्षता की द्योतक भी थी। लेकिन आज हम पत्रकार ही सबसे ज्यादा जातिवादी हो रहे हैं। खबरें रूकती और चलती भी जातियों के आधार पर है।
हो सकता है मेरी बातें आप को बुरी लगे, अगर ऐसा हो तो आप सब से क्षमा प्रार्थी हूं। एक संपादक के तौर पर मैं हम सब के लिए चिंतित हूं इसलिए ही कुछ कड़वी बाते कह रही हूं लेकिन ये कड़वापन हो सकता है हमारी पत्रकारिता के लिए अमृत हो। इसलिए आओं हम सब मिलकर हमारी गिरती साख और गिरती पत्रकारिता के लिए विचार करें।

कविता नरूका,
प्रधान संपादक, फोकस भारत