फोकस भारत। राजस्थान में दलित उत्पीड़न की घटनाएं रोजाना सामने आ रही है और सरकार मौन है। लेकिन इन घटनाओं के बीच दलित समुदाय में आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। जालौर में मंदिर में प्रवेश को लेकर दलितों पर सवर्णों ने हमला कर दिया। जिसके बाद इलाके में तनाव व्याप्त है। घटना के बाद सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार भंवर मेघवंशी ने इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए दलितों से सामूहिक रूप से हिन्दू धर्म का त्याग करने का आह्वान किया है। मेघवंशी ने इसे लेकर फेसबुक पर एक लेख लिखा है। भंवर मेघवंशी की फेसबुल वॉल से शब्दश:लिया गया लेख।

जालौर की घटना के विरोध में दलितों को सामूहिक रूप से हिन्दू धर्म छोड़ देना चाहिए !!
……. आखिर इन जातिवादी मन्दिरों में कब तक हम अपने सिर फुड़वाते रहेंगे ?
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खबर है कि सामन्ती राजस्थान के अतिसामन्ती जालोर जिले के किसी हिन्दू मंदिर में पत्थर के भगवान में प्राण फूंके गये ।
मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा में बाड़मेर के प्राग मठ के दलित संत शम्भुनाथ भी अपने शिष्यों के साथ गए । सुबह वो अपनी भक्त मण्डली के साथ देवदर्शन को गये। उस देवता से मिलने जिसमें एक दिन पहले ही प्राण फूंके गए थे।
देवता में प्राण नहीं आये ,मगर उसके हिन्दू उच्च जाति भक्तों के प्राण जोर मारने लगे और वे दलित संत और उनके भक्तों के प्राण लेने पर उतारू हो गये ।
लट्ठ लिये हिंदुओं ने चार दलितों के सिर फोड़ दिये ।अब घायलों का इलाज चल रहा है । मुकदमा भी दर्ज हो गया है ।
जानवरों की रक्षा करने वाले दल चुप है । हिन्दू हित रक्षक वाहिनियां खामोश हो चुकी है । सब तरफ सन्नाटा है ।
इस मनुवादी कार्य को करने गए घायल दलितों के लिये भी अम्बेडकरवादी साथी ही बोल रहे है ,वे ही जोर शोर से आवाज़ उठा रहे है।
पर यह वक़्त भावुक होने का नहीं है । जरा रुकिए ,थोडा सोचिये ।
क्या हम खुद से यह सवाल नहीं करें कि आखिर कब तक पत्थर के इन भगवानों के चक्कर में हम लोग सिर फुड़वाते रहेंगे ? क्या वास्तव में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा होती है ,अगर होती तो जिस मूरत की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में महंत पधारे ,वह भगवान उनकी और उनके भक्तो की रक्षा करने क्यों नही आया ?
मेरा तो मानना है कि अब वक़्त आ चूका है जब हमारे लोगों को हिन्दू धर्म ,उसके देवी देवताओं और उनके मंदिरों को ठोकर मार कर नकार देना चाहिए और बाबा साहब द्वारा दिखाए गए रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए।
जालौर की घटना तालिबानी हिंदुत्व का ज्वलंत उदहारण है ।
संघ भाजपा के इस हिन्दू राष्ट्र में मार खाना ही दलित बहुजनों के हिस्से में बाकी बचा है ।
मार खाते रहो ,सिर फुड़वाते रहो ,पत्थर पूजते रहो ,मनुवाद की गोद में बैठे रहो और हर दिन जूते खाओ ,यही अंतिम विकल्प बचा है ।
अगर इस जुल्म का जवाब देना है तो….
सबसे पहले महंत शम्भुनाथ जी इस जातिवादी धर्म को तुरंत छोड़ने का ऐलान करें ।
उनके मार खाये और अपमानित हुए तमाम भक्त आज ही प्रण लें कि अब वे जीवनभर किसी मंदिर की चौखट पर नहीं जायेंगे।
जालौर के दलितों को सामूहिक रूप से इस घटना के विरोध में हिन्दू धर्म का परित्याग कर देना चाहिए ।
जब तक दलित ऐसा नही कर सकते है तब तक पशु व पत्थर पूजको को मनुस्मृति वाला उनका धर्म यह खुली छूट देता है कि वे दलितों के साथ अमानवीय अत्याचार जारी रखें ।
– भंवर मेघवंशी
( स्वतन्त्र पत्रकार एवम सामाजिक कार्यकर्ता )