फोकस भारत। राजस्थान के दिग्गज नेताओं में शुमार अशोक गहलोत ऐसे शख्सियत हैं जो अपनी सादगी और मृदुल स्वभाव से किसी को भी अपनी ओर खिंच लेते हैं। आमजन के साथ कार्यकर्ताओं उनकी पकड़ उनकी छवि का निर्माण करती है। इनकी यही खासियत उन्हें जनता के बीच एक लोकप्रिय नायक के रूप में प्रतिष्ठित किया है। चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में गहलोत हमेशा जमीन से जुड़े रहे। गरीब परिवार से निकलकर आए अशोक मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपनी सादगी को बनाए रखा। यही व्यक्तित्व उनको अपने विरोधियों से कई गुना अधिक मजबूत बनाता है। आज भी इनके घर के दरवाजे जनता और आम कार्यकरताओं के लिए खुले रहते हैं। बेझिझक कोई भी उनके आवास जाकर अपनी समस्यों को उनके सामने रख सकता है। गहलोत ने पार्टी द्वारा दी गई हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। इसकी बानगी पंजाब और गुजरात विधानसभा चुनाव में देखने को मिली। कांग्रेस पार्टी में अशोक गहलोत संगठन महासचिव के रुप में बड़ी भूमिका के साथ ही राहुल गांधी के ‘चाणक्य’ की भूमिका में है।
रिपोर्ट- कविता नरुका
अशोक गहलोत
कांग्रेस संगठन महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री राजस्थान
जन्मदिन- 3 मई 1951
-2 बार मुख्यमंत्री
-3 बार केन्द्रीय मंत्री
– 5 बार सांसद
4 बार निधायक
जीवन परिचय
अशोक गहलोत ने अपने दृध संकल्प की वजह से राजनीति में मुकाम हासिल किया, बल्कि ये भी बताया कि एक आम आदमी भी सपने देख सकता है। अशोक गहलोत का जन्म राजस्थान के जोधपुर शहर में हुआ। महामंदिर इलाके में बने छोटे से मकान में 3 मई 1951 को हुआ था। उन्होंने उस उक्ति को भी चरितार्थ किया कि पूत के पांव पलने में ही दिखते है। बचपन में ही पढ़ाई के साथ समाजसेवा से जुड गए । अशोक गहलोत के राजनीतिक और नीजि जीवन में कई उदाहरण है जिसमें संघर्ष, त्याग संवेदना और सादगी दिखती है। अशोक गहलोत ने स्कूल शिक्षा जैन स्कूल औऱ सुमेर हाई स्कूल से ली। उसके बाद जोधपुर की जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी से गहलोत ने विज्ञान और कानून में ग्रैजुएशन की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने अर्थशास्त्र विषय में पीजी किया। गहलोत का विवाह 27 नवंबर 1977 को सुनीता गहलोत के साथ हुआ। गहलोत एक बेटा (वैभव गहलोत) और एक बेटी (सोनिया गहलोत) के पिता हैं।
राजनीति में प्रवेश
अशोक गहलोत विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति से जुड़े रहे। सातवीं लोकसभा चुनाव(1980) में पहली बार जोधपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। गहलोत की करिश्माई नेतृत्व और जनसेवा से खुश होकर जनता ने उन्हें 8वीं लोकसभा चुनाव में भी इसी क्षेत्र से प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया। गहलोत के व्यक्तित्व का ही यह कमाल है कि वह यहां से लगातार 10वीं, 11वीं, और 12वीं लोकसभा के भी चुनाव जीते। इसके बाद वे केंद्र से राज्य की राजनीति में आ गए। साल 1998 में 11वीं राजस्थान विधानसभा के लिए सरदारपुरा (जोधपुर) से गहलोत को विधायक चुना गया। इसी विधानसभा क्षेत्र से जीतकर वर्ष 2003 में विधायक बने। पांच साल बाद 2008 में गहलोत ने तीसरी बार सरदारपुरा विधानसभा से जीत का परचम लहराया। दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। 34 वर्ष की उम्र में अशोक गहलोत राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बनाए गए थे।
केंद्रीय मंत्री के रुप में सेवाएं
अशोक गहलोत कांग्रेस के ऐसे नेता हैं जो इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक कांग्रेस के श्रेष्ठ नेतृत्व के साथ काम करने का अवसर प्राप्त किया। गहलोत के पास केंद्र में काम करने का अच्छा अनुभव है। वे पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी,राजीव गांधी और पी.वी.नरसिम्हा राव के मंत्रीमण्डल में केन्द्रीय मंत्री के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। वे तीन बार केन्द्रीय मंत्री बने। इन्दिरा गांधी की सरकार में गहलोत को पर्यटन और नागरिक उड्डयन उपमंत्री बनाया गया था। इसके बाद वे खेल उपमंत्री भी रहे। उनकी कार्यशैली को देखते हुए उन्हें केन्द्र सरकार में राज्य मंत्री भी बनाया गया। इसके बाद उन्हें केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री बनाया गया ।
मुख्यमंत्री के रूप में
केंद्र से राज्य की राजनीति में आने के बाद जून 1989 से नवम्बर, 1989 की अल्प अवधि के बीच गहलोत राजस्थान सरकार में गृह और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के मंत्री रहे । इसके बाद वे लम्बे अवधि तक सत्ता के केंद्र से दूर रहे। साल 1998 में पहली बार पांच सालों के लिए अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंभी बने। फिर 2008 में भी कांग्रेस पार्टी ने गहलोत का मुख्यमंत्री बनाया। दूसरे टर्म में भी उन्हें पांच साल तक के लिए नेतृत्व प्राप्त हुआ।
अशोक गहलोत का योगदान
समाज सेवा की भावना से ओत-प्रोत अशोक गहलोत ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान रिफ्यूजी कैंपों में अपनी सेवाएं दीं.
महाराष्ट्र के कई जिलों और गांवों में कच्ची बस्ती के विकास और उनकी देखभाल के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों में भी अशोक गहलोत ने काम किया.
नेहरू युवा केन्द्र से जुड़े अशोक गहलोत ने प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में भी कई काम किए.
अशोक गहलोत, भारत सेवा संस्थान, जो गरीब लोगों को मुफ्त किताबें और एम्बुलेंस की सुविधा उपलब्ध कराता है, के संस्थापक हैं.
मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अशोक गहलोत ने पानी बचाओ, बिजली बचाओ, सबको पढ़ाओ का नारा देकर आम जनमानस का ध्यान इन जरूरतों के प्रति केन्द्रित किया.
इन सबके अलावा अशोक गहलोत नई दिल्ली स्थित राजीव गांधी स्टडी सर्कल के सदस्य भी हैं, जो देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के शिक्षकों और विद्यार्थियों के हितों के लिए काम करता है
अनकहे दिलचस्प किस्से
-अशोक गहलोत बेहद लो प्रोफाइल राजनेता हैं। उनके बारे में मशहूर है कि वे अपनी टीम में भी ऐसे ही अफसर रखना पसंद करते हैं। बहुत कम लोग शायद इस बात को जानते हों कि यह कद्दावर नेता अपनी गाड़ी में हमेशा पारले-जी बिस्किट रखकर चलते हैं। जबकि चाय का शौक कुछ ऐसा है कि कहीं भी तलब लगने पर सड़क किनारे भी चाय पीने से गुरेज नहीं करते हैं।
-गहलोत, स्टूडेंट लाइफ से ही राजनीति में दिलचस्पी रखने लगे थे। स्कूली दिनों से ही वे समाजसेवा में भी सक्रिय हो चुके थे।
-1971 में जब भारत-पाक युद्ध के समय बाल वाहिनी कैम्प से जुडे । पत्रकार व गांधीवादी विचारक नेमीचंद जैन ‘भावुक’ ने अशोक गहलोत को डॉ. सुब्बाराव के पास भेजा था।
-गहलोत कांग्रेस में उन थोड़े से नेताओं में शुमार हैं जिन्हें ‘पार्टी संगठन’ का व्यक्ति कहा जाता है और जो अपने सामाजिक सेवा कार्य के ज़रिए इस ऊँचाई तक पहुंचे हैं।
-गहलोत ने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत जोधपुर के अस्पतालों में भर्ती मरीज़ों को संभालने से की थी। वो दूर दराज़ के गावों से आकर भर्ती हुए मरीज़ों से मिलकर उनके गांव-परिजनों को कुशलता की चिट्ठियां लिखते थे। पोस्ट कार्ड लिखा करते थे।
-फिर वो जोधपुर में तरुण शांति सेना से जुड़े और शराब की दुकानों के विरोध आंदोलन में खड़े मिले। गहलोत पर कांग्रेस नेतृत्व की नज़र तब पड़ी जब वो 1971 में पूर्वी बंगाल के शरणार्थी शिविरों में काम करते दिखे।
-अशोक गहलोत रविन्द्र मंच पर जादू की कला भी दिखा चुके है ।
-राजस्थान में जब अकाल पड़ा तो गहलोत ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी को राजस्थान अकाल कमेटी बनाया और जिला कांग्रेस कमेटी को अकाल कमेटी बनाया था। गहलोत ने अकाल प्रबंधन का कुशल ढंग से प्रबंधन किया । केंद्र मे भाजपा की सरकार थी और वहां से कोई मदद नहीं मिल रही थी
लेकिन गहलोत ने इस बुरे समय मे भी अकाल का बेहतरीन प्रबंधन किया था और गहलोत का प्रबंधन देखकर स्वयं वाजपेई ने संसद मे कहा था कि मुख्यमंत्रियों को गहलोत से सीखना चाहीये कि सीमित संसाधनों से कुशल प्रबंधन कैसे किया जाता है
– सूत की मालाएं पहनाने को गहलोत ने बढ़ावा दिया ताकि फिजुलखर्ची के रोकने के साथ ही गांधीवादि विचारधारा को बढ़ाया जा सके। गहलोत प्राय: सूत की माला पहनना पसंद करते हैं और हर साल लोगों को गाँधी डायरी भेंट करना नहीं भूलते।
जोधपुर के गांघी कुष्ठ आश्रम में जन्मदिन, दिवाली –होली मनाते आ रहे है। सीएम बनने के बाद भी ये सिलसिला जारी रहा। 2011 में आदिवासियों के बीच में जन्मदिन मनाया था।
-नारंगी की गोली और चिकनी सुपारी पसंद है।
– अशोक गहलोत ने ‘टिफिन गोठ’ की शुरुआत की थी। अभी भी कांग्रेस के कार्यकर्ता टिफिन लाते है और कार्यकर्ता- नेता मिलकर खाना खाते है। बराबरी का दर्जा देने के लिए ये परम्परा शुरु की गई थी।
-अशोक गहलोत को फौजदार सेनापति कहा जाता है।
-अशोक गहलोत को जब गुजरात का प्रभारी बनाया तो गुजरात के चुनावो मे आम कांग्रेस कार्यकर्ता की तरह घर घर चुनाव प्रचार करते हुए नजर आए।
-साल 1982 में जब वो दिल्ली में राज्य मंत्री पद की शपथ लेने ऑटोरिक्शा में सवार होकर राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक लिया था। मगर तब किसी ने सोचा नहीं था कि जोधपुर से पहली बार सांसद चुन कर आया ये शख्स सियासत का इतना लम्बा सफ़र तय करेगा।
-उनके साथ काम कर चुके पार्टी के एक नेता ने कहा कि गहलोत कार्यकर्ताओं के नेता हैं और नेताओं में कार्यकर्ता। उनकी सादगी, विनम्रता, दीन दुखियारों की रहनुमाई और पार्टी के प्रति वफ़ादारी ही उनकी पूंजी है।
-गहलोत गाँधी, मार्टिन लूथर किंग और कबीर से प्रेरित हैं। जब वो पहली दफ़ा मुख्यमंत्री बने तो राज्य सचिवालय में गाँधी की बड़ी प्रतिमा लगवाई। उनके दफ़्तर में प्राय: गाँधी, मार्टिन लूथर किंग और गाँधी परिवार के नेताओं की तस्वीरें मिलती थीं।
-साल 2010 में जब गुर्जर नेता आंदोलन पर उतरे तो किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में गुर्जर नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया गया। बातचीत के बाद गहलोत इन नेताओं को गाँधी और मार्टिन लूथर किंग की तस्वीरों तक ले गए और बोले, “इन दो नेताओें ने अपना जीवन शांति और सद्भाव को समर्पित कर दिया। आप कुछ भी करें तो इन दोनों का ज़रूर ध्यान रखें।”
-गुजरात से गहलोत का पुराना रिश्ता रहा है, जब 2001 में गुजरात में भूकंप आया, उस वक्त शायद राजस्थान पहला राज्य होगा जो मदद के लिए सबसे पहले पहुंचा। उस वक्त गहलोत मुख्यमंत्री थे। उन्होंने तुरंत टीम गठित करवाई और अपने अधिकारियों को राहत सामग्री के साथ गुजरात भेजा। गुजरात दंगों के बाद राजस्थान में पीड़ितों के लिए राहत कैंप खोले। कांग्रेस ने 2005 में जब दांडी मार्च की हीरक जयंती मनाई और साबरमती से दांडी तक 400 किलोमीटर की यात्रा निकाली तो गहलोत को समन्वयक बना कर भेजा गया।
-उनके समर्थक बताते हैं कैसे उन्होंने अपनी बेटी सोनिया का विवाह अत्यंत सादगी से किया था और बारात को छ़ोडने रेलवे स्टेशन गए तो सीएम रहते हुए एक-एक मेहमान की गिनती कर प्लेटफ़ॉर्म टिकट खरीदे थे।
-गहलोत टीवी की चमक-धमक से दूर रहना पसंद करते हैं। वो रेडियो के दिवाने है।इसीलिए एक बार जब उनकी पसंद का ट्रांज़िस्टर कहीं खो गया तो बहुत परेशान हुए।
-वो अपना राजनैतिक बयान खुद लिखते हैं और एक-एक शब्द पर गौर करते हैं।
-गहलोत उस वक्त पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने जब सूबे की सियासत में स्वर्गीय भैरों सिंह शेखावत का जलवा था। विपक्ष में रहते गहलोत स्वर्गीय शेखावत के प्रति बहुत आक्रामक थे। लेकिन मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही वो सबसे पहले उनसे मिलने पहुंचे और उनका आशीर्वाद लिया। जब शेखावत बीमार हुए तब गहलोत उन लोगों में से थे जो लगातार उनकी देखरेख करने जाते रहे।
-जोधपुर के पुश्तैनी घर में अब यहां उनके भाई अग्रसेन रहते हैं, लेकिन एक कमरे से अशोक गहलोत का खास रिश्ता है। कहते हैं कमरा उनके लिए लकी है। उनके करीबी बताते है कि अशोक गहलोत हर बार मतदान से पहले घर के इस कमरे में रुकते हैं और यहीं से मतदान करने जाते हैं। वोट डालने भी गहलोत उसी जैन वर्धमान स्कूल में जाते हैं जहां वो पांचवीं कक्षा तक पढ़े थे।
-उनके शिक्षक भरत सिंह कहते है कि अशोक गहलोत पढ़ाई में औसत थे, लेकिन आज्ञाकारी थे। उन्होंने कभी बदमाशी नहीं की।
-कॉलेज से निकले तो रोजगार का संकट खड़ा हो गया। अशोक गहलोत ने 1972 में बिजनेस में हाथ आजमाया। जोधपुर से पचास किलोमीटर दूर पीपाड़ कस्बे में खाद-बीज की दुकान खोली लेकिन यहां भी असफलता हाथ लगी। डेढ़ साल में ही कारोबार समेट कर जोधपुर लौटना पड़ा। जिंदगी के इसी उतार-चढ़ाव में गहलोत गांधी शांति प्रतिष्ठान में शांति तलाशा करते थे। उनके करीबि कहते है कि गहलोत ने गांधी दर्शन को जीवन में भी उतारा।
-राजस्थान के कद्दावर नेताओं के बीच सीधे-सादे और मिलनसार अशोक गहलोत से इंदिरा गांधी इतनी प्रभावित हुईं कि 1982 में उन्हें कैबिनेट में उपमंत्री बना दिया। 1984 में गहलोत राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सबसे युवा अध्यक्ष बना दिए गए। गहलोत के दोस्त बताते हैं कि दूसरे नेताओं ने सबकुछ दिया लेकिन राजनीतिक हैसियत नहीं, गहलोत ने गली-गली में नेता खड़े कर दिए। इस वजह से ही वह आगे निकले। इंदिरा गांधी के बाद अशोक गहलोत राजीव गांधी के भी विश्वासपात्र रहे। फिर सोनिया गांधी का भी भरोसा जीता। और अब राहुल गांधी के।
– मानसिंह देवड़ा से सीट खाली करवाकर पहला चुनाव लड़ा और 50 हजार के अंतर से जीता भी था। 1998 में पीसीसी चीफ बने तब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 156 सीट मिली थी । पहली बार कांग्रेस को इतनी सीट मिली थी ।
चुनाव लड़ने के लिए नहीं था पैसा, बाइक बेची
1980 में चुनाव लड़ने के लिए गहलोत के पास पैसे नही थे। अशोक गहलोत ने चार हजार रुपये में अपनी बाइक बेचकर वो चुनाव लड़ा था। अपने मित्र गणपत सिंह चौहान के साथ जाकर लोकसभा का टिकट लाए थे। जब जोधपुर लोकसभा का चुनाव लड़ने से सीनियर नेता पीछे हट गए। मौका देखकर 29 साल के नौजवान गहलोत ने लोकसभा का टिकट मांग लिया। दोस्त रघुवीर सैन का सैलून चुनावी कार्यालय बन गया। रघुवीर सैन बताते हैं कि हम दोनों ने बाइक पर घूमकर प्रचार किया। खुद गहलोत और हमने पोस्टर चिपकाए। तब हमारे पास पैसे नहीं थे। चुनाव जीतने के बाद गहलोत ने सबसे पहले नई बाइक खरीदी, अब ये बाइक रघुवीर सैन के पास ही है। 1980 में अशोक गहलोत देश के सबसे युवा सांसद बन गए थे, लेकिन उनके दोस्त के मुताबिक ये जादूगर की इमेज थी जिसकी वजह से इंदिरा गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री निवास आने का बुलावा भेजा था। सहपाठी बताते हैं कि गहलोत प्रधानमंत्री आवास जाते थे। राहुल और प्रियंका गांधी को जादू दिखाते थे।
साधारण जीवन में असाधारण काम
वो ना तो किसी प्रभावशाली जाति से हैं, ना ही किसी प्रभावशाली जाति से उनका नाता है, वो दून स्कूल में नहीं पढ़े. वो कोई कुशल वक्ता भी नहीं हैं। वो सीधा-सादा खादी का लिबास पहनते हैं और रेल से सफ़र करना पसंद करते हैं। नारायण बारेठ कहते है कि जब गहलोत गुजरात चुनाव का प्रभारी बनाया तो इसे राजस्थान की सियासत से गहलोत को दूर करने के संदेश के रूप में पढ़ा गया। मगर गुजरात के चुनाव अभियान ने उन्हें फिर मज़बूत भूमिका में ला दिया। वो इस कदर चुनाव अभियान में जुटे कि दिवाली पर भी अपने घर नहीं लौटे। आज राहुल गांधी के बाद दूसरे नम्बर पर संगठन महासचिव के रुप में है। बारेठ कहते है कि वो गाहे-बगाहे परिजनों के साथ मंदिरों की फेरी लगाते रहे हैं, मगर ज्योतिष और भविष्यवक्ताओें से दूर रहते हैं। गहलोत ने 2003 में प्रवीण तोगड़िया को उस वक्त गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जब उत्तर भारत की सरकारें उन पर हाथ डालने से बचती थीं। 10 दिन जेल में ऐसे टूटे कि आज तक खड़े नही हो पाए। गहलोत ने पुलिस से कहा था कि अगर शांति पूर्ण से सभा करे तो करने देना क्योंकि ये लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन भडकाऊ भाषण दे तो गिरफ्तार कर लेना। जयपुर के परकोठे में बरामदे खुलवाए, बुजुर्ग माता-पिता के लिए बच्चों को सेवा के लिए पाबंद करना ऐसे कई जनकल्याणकारी काम किए। ऐसे ही आशाराम बापू के मामले में पुलिस को सख्त कार्रवाई का निर्देश दिया और यही कारण है कि आसाराम बापू को आजीवन कारावास की साज हुई। गहलोत कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक संगठन के रुप में नही देखते बल्कि कांग्रेस 130 साल पुरानी संस्था है जिसने आजादी की लडाई का नेतृत्व किया। संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा रखते है। क्योंकि उन्हें लगता है कि इन संस्थाओं की प्रतिष्ठा रहेंगी तभी आम आदमी को ताकत मिलेगी।
पिता के समाजसेवा के काम को देखकर आगे बढे
उनके बचपन के दोस्त ज्ञानेश्वर गहलोत बताते है इनके पिताजी बाबू लक्ष्मण सिंह जी महामंदिर के 4 बार पार्षद रहे और जोधपुर नगर पालिका 3 बार अध्यक्ष रहे । इस दरमियान उनके पिताजी लोगो की बातें सुनते औऱ उसे दूर करने का प्रयास करते । इसी का प्रभाव अशोक गहलोत की जिंदगी पर पड़ा और कम उम्र में ही समाजसेवा के कार्य करने लगे। गहलोत के पूर्वजों का पेशा जादूगरी था। गहलोत के पिता स्व. लक्ष्मण सिंह गहलोत जादूगर थे। खुद गहलोत ने भी अपने पिता से ही जादू सीखा था। कुछ वक्त उन्होंने इस पेशे में हाथ भी आजमाए। लेकिन अशोक की नियति यह नहीं थी, उन्हें तो राजनीति के मैदान में जनता के बीच रहकर जीत के कीर्तिमान का जादू जो रचना था।
‘चिड़ियानाथ जी के श्राप को अपने कर्मों से मुक्त कराया’
राजनीतिक जीवन के साक्षी रमेश बोराणा बाते है कि वह ‘राजनीति के निर्णय में कठोर है लेकिन मन के सहद्य और कोमल भावनाओ के व्यक्ति है। इसलिए जब इनके निर्णय देखते है तो राजस्थान में निशुल्क दवा की बात हो या फिर पुशओं के लिए निशुल्क दवा की योजना जो अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में में चालू की। ये मानवीय पक्ष है जो राजनीति में बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है। इन्होंने राजनीति को कभी सता के रुप में नही देखा बल्कि समाजसेवा के रुप में देखा।अपने 48 साल के राजनीतिक जीवन में जोधपुर को नगर से महानगर बना दिया। मुझे याद है कि एक बार उन्होंने भाषण दिया था 1978 में जनता को कहा था कि मैं जोधपुर की गरिमा और मर्यादा को किसी भी कीमत पर कम नहीं होने दूंगा। और आपको जिस दिने ऐसा लगे मैं नही कर रहा था तो मुझे हाथ पकड़कर पद से हटवा सकते है। उनके मन में मानव कल्याण की भावना रहती है। मुख्यमंयत्री रहते हुए उन्होंने अपने ेआपको ट्रस्टी के रुप में देखा, कहते थे कि ये जनता का पैसा है , मैं महज एक ट्रस्टी हूं। साल 1988 की बात है जब लोगो को सुबह 4 बजे उठकर पानी गड्डे खोदकर निकालना पड़ता था। तब अशोक जी ने कहा था कि मैं लोगो के बीच जाऊंगा, हमने कहा था कि लोगो में आक्रोश है आप मत जाइए , तब उन्होंने कहा था कि नही मै जाऊंगा मेरी जनता दुखी है। वो 1 हफ्ते तक सुबह 4 बजे लोगों के बीच गए गली-गली घूमते थे। लोगो ने अपने नेता के प्रति आक्रोष व्यक्त किया और वो लिफ्ट कैनाल अविलम्ब लेकर आए । चिड़ियानाथ जी का श्राप था जोधपुर को कि अकाल पड़ेगा। कभी पानी नही होगा। उसे उन्होने अपने तप के कर्मों से मुक्त करा दिया। आज जोधपुर में पानी है’।
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मित्रो,सहपाठियों, और कार्यकर्ताओं के सुख-दुख होते शामिल
हनुमान सिंह खांगटा बताते है कि अशोक गहलोत आज भी अपने पुराने मित्रों और कार्यकर्ताओं के हर सुख-दुख में जाते है। जैसे एक उदाहरण देखिए जुगल किशोर काबरा जी को तकलीफ हुई तो गहलोत अहमदाबाद से समय निकालकर उन्हें संभालते रहते थे। गहलोत जी का सहपाठी, मित्रो और कार्यकर्ताओं के प्रति एक ऐसा भाव है जो अच्छे –अच्छे लोग पद मिलने के बाद भूल जाते है लेकिन अशोक गहलोत अपने कर्म से अलग पहचान बनाते है।
फिजुलखर्ची करने के लिए हमेशा रोका
ऐसे अनेको लोग है जो गहलोत को बाकी नेताओं से भिन्न मानते है। उनमें युगल किशोर शर्मा(बबलेश ) भी है। नेताओ की भीड़ में अशोक गहलोत इनके पसंद के नेता है। युगल कहते है कि गहलोत जब मुख्यमंत्री नही बनने थे ये उस समय की बात है 1997 में जयपुर के परकोटे में रैली निकल रही थी। हुजूम चल रहा था औऱ मैंने देखा एक लम्बा और पतला दुबना आदमी बीच में चल रहा है। मैंने उससे पहले गहलोत का नाम सुना था लेकिन कभी देखा नही। बस उस दिन से उनकी सादकी नें मुझे उनकी ओर खींचा। एक वाक्या बताते हुए कहते है कि एक बार मैं बड़ा गुलदस्ता ले गया तो उन्होंने कहा क्यों फिजुलखर्ची करते हो इस पैसे से गरीब को खाना खिला देते । उस घटना के 6 महीने बाद जब मैं मिलने गया औऱ उन्हें एक गुलाब का फूल दिया तो उन्होंने कहा ये होती है भावनाएं। उन्हे वो बात याद थी और उनका कहना था कि एक गुलाब से भी भावनाएं जताई जा सकती है। फिजुलखर्ची बेकार है। मैं आज भी उनसे मिलने जाता हूं तो नए कपड़े नए जुते पहन कर जाता हूं लेकिन मैंने उन्हें देखा है कि वो किसी से भी मिलने जाए हमेशा सादगी के लिबास में रहते है, वहीं हवाई चप्पल पहनते है आज भी।
डॉक्टर बनना चाहते थे गहलोत
हाईस्कूल के दोस्त गोवर्धन परिहार बताते है कि गहलोत स्कूल के दिनों में ही विज्ञान, बिजली के फायदे , पानी की समस्या जैसी बाते करते थे। उनके शब्दों में हमेशा विकास और परिवर्तन होते थे। अशोक गहलोत स्काउट और एनसीसी के जरिए होने वाली समाज सेवा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। वाद-विवाद में माहिर थे। इसी शौक ने उन्हें पहला सार्वजनिक पद यानी छात्रसंघ में उपमंत्री का ओहदा भी दिलवा दिया। मैंने उनकी वाद विवाद में रुचि को देखते हुए अपने छात्रसंघ मंत्रिमंडल में उप मंत्री बनाया। ये ओहदा मिलने के बाद भी गहलोत सियासत में कैरियर नहीं बनाना चाहते थे। डॉक्टर बनने की हसरत के साथ उन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, लेकिन ये सपना पहले साल ही टूट गया। गहलोत पीएमटी में बैठे, डॉक्टर बनने का सपना था लेकिन फेल होने पर टूट गया। अशोक गहलोत को बीएससी की डिग्री से संतोष करना पड़ा। लिहाजा पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए इकोनॉमिक्स चुन लिया। यहीं से सियासी सफर भी शुरू हो गया। शुरुआत छात्रसंघ चुनाव में दोस्त के हाथ मिली हार के साथ हुई। राजस्थान हाईकोर्ट में सरकारी वकील पन्ने सिंह राठौड़ बताते हैं कि हमने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन हम साथ में प्रचार करते थे, दोस्त थे।
गहलोत के इस काम को प्रदेश में दुबारा है करने की जरुरत
राजस्थान में कांग्रेस का वजूद आज भी कायम है इसके पीछे वजह है। वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ का विश्लेषण है कि जब मैं जर्नलिज्म में आया था तो तब नवभारत टाइम्स कोटा जॉइन किया था। उस वक्त अशोक गहलोत पीसीसी अध्यक्ष बने थे। उस वक्त रोज ऑफिस में विज्ञप्तियां आती थी आज यहां प्रकोष्ठ बनाया । आज वहां प्रकोष्ठ बनाया । ऐसे लोगो के नाम जिन्हें कोई जानता ही नही था। लेकिन कुछ समय बाद मैंने महसूस किया कि इस शख्स ने चमत्कार कर दिया। अशोक गहलोत ने गांव -कस्बों में प्रकोष्ठ बनाए और उसमे उन लोगो को शामिल किया जिनकी आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक हैसियत नहीं। कोई मोची था, कोई सुनार था, कोई लखारा था। ऐसे साधारण लोगो को लेटर पेड पर नाम दिया। जो कोई मंत्री नही थे, किसी प्रभावशाली के बेटे नही थे। ऐसे साधारण लोगों की पहचान बनी और वो कांग्रेस के नाम पर घूमने लगे। उससे उनकी हैसियत बढ़ी और कांग्रेस को ताकत मिली। गहलोत ने हर ब्लॉक -तहसील में 5-6 प्रकोष्ठ बनाए। वो ताकत राजस्थान में 20 सालों से चली आ रही है। इसलिए गहलोत जहां जाते है वहां उनको लोग मिल जाते है। भीड़ अपने आप जुट जाती है। ये काम बाकी राज्यों में नही हुआ और राजस्थान में दुबारा नही हुआ।