किसान बिल पर इस्तीफे का ये दांव डेढ़ साल बाद पंजाब चुनाव में निकलेगा तुरुप का इक्का ?

फोकस भारत। केन्द्रीय मंत्री और शिरोमणि अकाली दल की नेत्री हरसिमरत कौर बादल ने गुरुवार को नरेन्द्र मोदी कैबिनेट से कृषि विधेयक का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्वीकार कर लिया है। राजनीतिक पंड़ित कहते है कि हरसिमरत कौर ने ऐसे ही कुर्सी नहीं छोड़ी है बल्कि करीब डेढ़ साल बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव है जिनको देखते हुए सियासी बिसात बिछाई है।

किसान और कृषि दोनों पंजाब के अहम मुद्दे

राजनीतिक प्रेशक कहते है कि अकाली दल सुप्रीमो सुखबीर सिंह बादल ने हरसिमरत कौर के इस्तीफे को पार्टी द्वारा किसानों के लिए एक बड़े बलिदान के रूप में पेश किया है जो एक सियासत की रणनीति का हिस्सा है। पंजाब में कृषि और किसान ऐसे अहम मुद्दे हैं कि कोई भी राजनीतिक दल इन्हें नजरअंदाज कर अपना वजूद कायम रखने की कल्पना भी नहीं कर सकता है,  2017 के विधानसभा चुनाव में किसानों के कर्ज माफी के वादे ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी में कराई थी जबकि उससे पहले किसानों को मुफ्त बिजली वादे के बदौलत ही अकाली दल सत्ता पर काबिज होती रही है, वहीं किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के बीच कांग्रेस का कर्ज माफी का वादा अकाली दल की 10 साल पुरानी सरकार को सत्ता से बेदखल करने में सफल रहा था।

 

शिरोमणि अकली दल की सियासी बिसात

दरअसल अकाली दल की तरफ से मोदी सरकार में हरसिमरत कौर बादल ही एकमात्र कैबिनेट मंत्री थीं।  पंजाब की यह राजनीतिक दल भाजपा का सबसे पुराना सहयोगी दल है, जिसका भाजपा से ज्यादा पंजाब में अकाली दल का राजनीतिक प्रभाव ज्यादा है और यहां की सियासत किसानों के मुद्दे पर ही केन्द्रीत रहती है। राजनीतिक प्रषेक का कहना है कि किसानों को अपनी तरफ करने और साधने के लिए ये शिरोमणि अकाली दल का एक रणनीतिक सियासी कदम है। जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिलेगा।

 

किसान संगठनों के विरोध की वजय ये

कृषि विधायकों को लेकर किसान संगठनों के द्वारा यह कहा जा रहा है कि किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य ही आमदनी का एकमात्र जरिया है,  अध्यादेश इसे भी खत्म कर देगा, इसके अलावा कहा जा रहा है कि ये अध्यादेश साफ तौर पर मौजूदा मंडी व्यवस्था का खात्मा करने वाले हैं, मसलन पंजाब में किसान पिछले 3 महीने से इन अध्यादेशों का विरोध कर रहे हैं।